Friday, 1 June 2018

ठहराव

था ठहरा सब कुछ,
जाने कितने दिनों से।
जड़ता जाने ये कैसी थी,
थी भी कहीं या नही थी।
ना शब्द मिले, ना कलम चली,
ज़िन्दगी थमी, पर रुकी नही।
कुछ लिखने को ना था,
बात ये भी बिल्कुल ना थी।
मन में मन के ख़्याल थे,
ज़िन्दगी के उलझे सवाल थे।
वक़्त की ना थी कमी कोई,
मैं ही थी शायद कहीं खोई।
हाँ शायद पहचाना है खुद को,
इन दिनों बहुत जाना है खुद को।
ज़ाया कुछ भी यूँ ही कहाँ गया,
समझो वक़्त ने मुझे थोड़ा वक़्त दिया।
ठहराव था एक ये ज़िन्दगी का,
बदलाव था एक ये ज़िन्दगी का।
अब जो उठा ली है ये कलम,
रुकना कहाँ है, मुझे पता नही।

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