Wednesday, 20 May 2015

तुम हो...तो मैं हूँ...तुम बिन...मैं क्या हूँ...

कहते हैं जननी से धन्य ना कोई हो सका है और ना ही कभी होगा। एक माँ जो अपने बच्चे को अपने ही रक्त से सींचती है, उसे अपने ही शरीर का हिस्सा देकर उसके जिस्म को रूप देती है, वह केवल जीवन नही देती है वरन् वह निर्माण करती है सृष्टि के सबसे बेहतरीन प्राणी का, अर्थात् मनुष्य का। माँ बनने का सुख शायद इस सृष्टि के सभी सुखों से ऊपर का सुख होता है। और हो भी क्यूँ ना। वह एक माँ ही तो होती है जो जीवन चक्र को आगे ले जाती है। मैंने लोगों को कहते सुना है कि वो लोग बहुत खुशनसीब होते हैं जिनके सिर पर उनकी माँ का हाथ हमेशा रहता है। जाने कितनी ही बार मैंने एक बहुत ही चर्चित गाने की इन पंक्तियों को सुना भी है और गाया भी है,
"वो होते हैं किस्मत वाले जिनकी माँ होती है...ओ माँ...!" 

और हाँ दोस्तों यकीन मानिये मैं सच में खुशकिस्मत हूँ कि मेरे सिर पर भी मेरी माँ का साया है। माँ के बिना मैं अपनी ज़िन्दगी की कल्पना भी नही कर सकती हूँ।
"वो हैं तो मैं हूँ...उन्ही से तो मैं हूँ..." 

आज भी जब मुड़के देखती हूँ तो पता ही नही चलता कि कब मेरा बचपन मुझे छोड़ कर चला गया और कब जवानी ने दस्तक दे दी। मुझे वैसे ये कभी लगता ही नही है कि मैं बड़ी होती जा रही हूँ, या मेरी उम्र साल-दर-साल बढ़ती जा रही है। शायद इसका सबसे बड़ा कारण ये भी है कि आज भी जब मैं माँ को देखती हूँ तो मेरे भीतर का मेरा बचपन फिर से लौट आता है। मैं ये नही कहती कि मैं अपने पापा से प्यार नही करती हूँ। बिल्कुल करती हूँ और कसम से बहुत प्यार करती हूँ, इतना कि शायद मैं खुद एक बार उनसे लड़ भी जाऊँ लेकिन अगर कोई और उन्हें ज़रा-सा भी कुछ कह दे तो पता नही मैं क्या करुँगी। वैसे मैंने लोगों को कहते सुना है कि बेटियाँ अपने पापा के ज़्यादा करीब होती हैं। लेकिन मुझे लगता है मैं माँ के ज़्यादा करीब हूँ। कई बार तो पापा को चिढ़ाने के लिए ये भी कहती हूँ,
"हमारी तो बस माँ हैं...!" :-P


मुझे अपना बचपन याद है आज भी लेकिन जब मैं बहुत छोटी थी तो उन दिनों की याद को याद रखना तो मेरे लिए मुमकिन ही नही है। इसीलिए जब-जब मैं बचपन की कोई बात जानना चाहती हूँ तो माँ से पूछ लेती हूँ। माँ बताती हैं कि बचपन में मैं बैठी-बैठी जाने क्या सोचती रहती थी। और जब वो मुझसे पूछती थीं कि मैं क्या कर रही हूँ तो मैं बस यही बोलती थी,"सोच रही हूँ।" ;-) माँ आज भी इस बात को लेकर मजाक बनाती हैं मेरा कि जाने क्या सोचती रहती थी बचपन में। और मैं खूब हँसती हूँ ये कह कर कि देखो ना माँ बचपन से सोचती हूँ तभी तो लिखने का शौक़ है मुझे। :-P

मुझे याद है माँ मेरे स्कूल के टिफ़िन में जब-जब आलू की जीरे वाली स्पेशल सब्जी बना कर मुझे देती थीं तो मेरे सारे दोस्त मेरे टिफ़िन का सारा खाना खा जाते थे। आज भी जब मेरा दिल करता है तो माँ मेरी फ़रमाईश पर हलवा बना देती हैं। माँ बेशक़ उतना अच्छा खाना ना बनाती हों पर कुछ तो बात है उनके हाथ के खाने में कसम से। :-*

माँ ने बहुत कुछ किया है मेरे लिए, बहुत बार पापा की मार से भी बचाया है बचपन में। :-P लेकिन कभी-कभी तो माँ ने एक माँ से ज़्यादा एक दोस्त की भूमिका अदा की है मेरी ज़िन्दगी में। मुझे याद है जब मैं दिल्ली में कोचिंग के लिए गई थी तो 10 या 15 दिन के अंदर ही मेरी हिम्मत टूट गई थी। मैंने जैसे ही घर फ़ोन किया और ये कहा कि शायद मुझसे इतनी पढ़ाई नही हो पाएगी तो पापा नाराज़ हो गए थे। उनके फ़ोन के बाद माँ ने मुझे फ़ोन किया और उस वक़्त जिन शब्दों की मुझे ज़रूरत थी माँ ने बिल्कुल उन्ही शब्दों में मुझे समझाया। मेरी टूटी हिम्मत को जोड़ा, मुझे फिर से हौंसला दिया। माँ कभी-कभी जादू कर देती हैं कसम से। हर मुश्किल का हल है उनके पास, चाहे वो बड़ी हो या छोटी। और हल ना भी हो तो बस उनका साथ काफ़ी है फिर मुसीबत खुद ही भाग जाती है।

माँ ये आपके लिए,
"तुमसे ज़िन्दगी मिली,
तुमसे साँसें मिलीं।
जो भी हूँ मैं आज,
वो हस्ती तुमसे मिली।।" 

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Tuesday, 19 May 2015

वो यादें मेरे बचपन की


याद नही मुझको यूँ तो,
हर याद मेरे बचपन की।
याद नही मुझको यूँ तो,
हर बात मेरे बचपन की।
फिर भी कुछ तो है ऐसा,
जिसको मैं अब तक भूली नही।
हाँ, याद है मुझको कैसे,
माँ की गोद मेरा बिस्तर थी।
याद तो हाँ ये भी है कि
मैं तड़पती बिन माँ किस तरह थी।
माँ के पीछे-पीछे भागना था,
सबसे प्यारा खेल मेरा।
आँसूं छलक आते थे जो ना होता,
माँ से जल्दी मेल मेरा।
याद है मुझको कैसे माँ,
मेरे गिरने पर ज़मीन को मारती थी।
हाँ ये भी याद है कैसे,
उसके बाद मुझे माँ पुचकारती थी।
जब पापा आते थे ऑफिस से,
माँ किस्से उन्हें मेरे सुनाती थी।
पूरे दिन की मेरी दिनचर्या का,
माँ हाल पूरा-पूरा बताती थी।
मेरे हँसने, मेरे रोने पे कैसे,
जान माँ अपनी छिड़कती थी।
जब-जब कोई छेड़ता था मुझे,
तो माँ खूब भड़कती थी।
याद है मुझको आज भी,
माँ के हाथ की बनी सब्जी।
वो सब्जी जिसपे फ़िदा थे,
सारे ही तो दोस्त मेरे।
माँ ना थकी, ना रुकी कभी,
मेरी शरारतों पे नही की शिकायत कोई।
बचपन गया, गुज़रे साल,
ना माँ बदली, ना माँ का प्यार।
आज भी माँ वैसी ही है,
आज भी माँ प्यारी ही है।
कभी-कभी गुस्से में शायद,
मैंने उनको कुछ तो सुनाया होगा।
शायद अनजाने में ही सही,
पर दिल उनका दुखाया होगा।
माँ रूठी भी हैं, माँ नाराज़ भी हुई,
पर मोहब्बत में माँ की ना आई कमी कोई।
कभी-कभी मैं सोचती हूँ,
इतनी शक्ति माँ में कहाँ से आती है?
भला कैसे एक अकेली माँ,
सारे ही घर को सम्भाल जाती है।
एक दिन शायद मैं भी,
इस राज़ को जान जाऊँगी।
माँ किस शक्ति का है रूप,
मैं भी एक दिन पहचान जाऊँगी।
माँ को मैंने कभी ये कहा नही,
माँ को ये मैंने कभी बताया नही।
देना चाहती हूँ एक दिन मैं माँ को,
एक ख़ूबसूरत-सा तोहफ़ा।
एक अनमोल-सा, नायाब-सा,
जिसकी कोई कीमत भी ना आँक सके।
काश मैं अपनी हर बात में,
माँ की दी शिक्षा को दिखा पाऊँ।
काश मैं अपनी हर याद में,
माँ की भी एक याद को सजा पाऊँ।
यूँ सब कुछ तो मुझको याद नही,
यूँ सब कुछ तो मैं भूली भी नही।
फिर भी याद है मुझे माँ,
वो यादें मेरे बचपन की...
वो यादें मेरे बचपन की...

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Sunday, 17 May 2015

हाथों में लिए हाथ तुम्हारा


ना फ़िक्र आने वाले कल की हो,
ना चिंता मुझे अगले पल की हो।
आँखों में बस सपने हो कईं,
ज़िन्दगी लगे हर पल ही नई।
चलूँ होकर बेफ़िक्र-सी मैं,
हाथों में लिए हाथ तुम्हारा।

ना मंज़िलों से दूर होने का डर हो,
ना रास्ते में कहीं खोने का डर हो।
ज़हन में बस ख़्याल हो कईं,
ज़िन्दगी चले हर पल ही सही।
चलूँ होकर बेबाक-सी मैं,
हाथों में लिए हाथ तुम्हारा।

ना ख़ामोशी ही ख़ामोश हो,
ना तन्हाई ही बोलती हो।
दिल में बस जीने के बहाने हों कईं,
ज़िन्दगी लगे हर पल ही हसीं।
चलूँ होकर बेपरवाह-सी मैं,
हाथों में लिए हाथ तुम्हारा।

ना खौफ़ ज़माने का हो,
ना ग़म कुछ खो जाने का हो।
लबों पे बस मुस्कान हों कईं,
ज़िन्दगी रहे हर पल ही खिली।
चलूँ होकर बेख़ुद-सी मैं,
हाथों में लिए हाथ तुम्हारा।