Saturday, 13 June 2020

लिखने बैठे...तो सोचा...

लिखने बैठे, तो सोचा,
यूँ लिख तो और भी लेते हैं,
ऐसा हम क्या खास लिखेंगे?
कुछ लोगों को तो ये भी लगेगा,
कि क्या ही होगा हमसे भला,
हम फिर कोई बकवास लिखेंगे!
अच्छा, यूँ वे हैं कुछ नहीं,
पर देखना कसम से,
जाने कितनी गहरी बात लिखेंगे!
मौन भी हैं कुछ लोग वैसे,
उनकी भी अपनी मर्ज़ी है,
शायद चुप्पी में वो अपने जज़्बात लिखेंगे!
कोई मुद्दा उठा लेगा गम्भीर-सा एक,
उसको उधेड़ेगा उसकी तह तक,
फिर बहुतेरे, उस पर इतिहास लिखेंगे!
दर्द जिसका है वो बस देखेगा,
खुद को कहानी होने से रोकेगा,
पर लोग फिर भी उसके हालात लिखेंगे!
और हाँ कुछ तो ऐसे भी ज़रूर होंगे,
जो खुद को समझते हैं महा ज्ञानी, महा पण्डित,
देखना किस्सा वो ऐसा दर्दनाक लिखेंगे!
लिखने बैठे, तो सोचा,
यूँ लिख तो और भी लेते हैं,
ऐसा हम क्या खास लिखेंगे???



Tuesday, 31 March 2020

काश! फिर वही काश

कभी-कभी आगे बढ़ते हुए जब अचानक पीछे मुड़ कर देखते हैं तो ख़्याल आता है कि काश उस वक़्त ये ना हो कर वो हो गया होता तो शायद आज तस्वीर कुछ अलग होती ज़िन्दगी की!
बहुत मुमकिन है कि ऐसा एक कोई ख़्याल कहीं आपके मन में भी आता होगा! यूँ हर किसी को वो सब नसीब नही होता है जो भी उसने चाहा होता है अपनी ज़िन्दगी से! हाँ ये और बात है कि समझौता-सा कर लेते हैं हम वक़्त और ज़िन्दगी दोनों के साथ!
कहीं इसे पढ़ते-पढ़ते ऐसा तो नही सोचने लगे आप कि क्या फिर वही "ऐ काश!" वाली पुरानी कहानी ले कर आ गई हूँ मैं! सोच रहे हैं क्या?
हाँ, सही सोच रहे हैं आप!
क्या करूँ, मैं गलत भी तो नही हूँ! बताईये ऐसा कौन ही होगा जिसने ज़िन्दगी में ज़्यादा ना सही पर कम से कम एक बार तो पीछे मुड़ कर ज़रूर देखा होगा और सोचा होगा कि क्या होता अगर उस वक़्त ये हो गया होता, या वो मिल गया होता, या फिर वो फैंसला ना लिया होता या उससे अपने दिल की बात कह दी होती या वक़्त रहते वो सब कर लिया होता जो करने का मन था!
बताईये होगा क्या कोई ऐसा?
अच्छा अगर सच में ऐसा कहीं कोई है ना तो कसम से किस्मत का धनी है वो!
वैसे कोई ज़रूरी नही कि आप मेरी हर बात से सहमत हों! विचार मेरे हैं पर सोच आपकी अपनी है! इच्छुक हों तो पढ़ते रहें और हाँ कभी-कभी आलोचनात्मक ही सही पर अपने विचार भी देते रहें!
कहीं ऐसा ना हो कि कल आप ये कहें,"काश! कुछ तो लिख दिया होता, काश! कुछ तो कह दिया होता!"

चलिए अब विराम देते हैं इस काश को,
"मुड़ कर देखा पीछे मैंने भी,
देखा कि कहीं कुछ कमी है क्या,
यूँ खुश हूँ आज बहुत,
पर फिर अचानक लगा
कि
काश!
अगर वो हो गया होता
तो आज ये ना होता,
और
फिर ख़्याल आया
कि
अगर वो ना हुआ होता
तो फिर
ये भला कैसे होता...?"

Tuesday, 14 January 2020

ऐसा नही है कि वो कहता नही है...

ऐसा नही है कि वो कहता नही है,
हाँ लबों पर उसके कुछ रहता नही है।
यूँ आँखों से वो बातें बेहिसाब करता है,
ईशारों की शरारतें भी लाजवाब करता है।
ऐसे तो कहता है उसे आता नही है जताना,
पर इतना भी मुश्किल तो नही है बताना।
जब वो अचानक से देखता है छुपकर,
जब वो अचानक से मुड़ता है चलकर।
कभी साथ बैठकर पढ़ता है किताब वो,
कभी यूँ ही माँग लेता है कितने जवाब वो।
दिखाई दे कर भी दिखाई देती नही है,
उसकी हर अदा कितनी तो हंसी है।
यूँ शब्दों में कभी वो लायेगा नही,
हाँ यकीं है कभी वो बताएगा नही।
प्यार है उसको बेशुमार तुमसे,
कहेगा तो नही वो हर बार तुमसे।
ज़िक्र जब-जब तुम्हारा कहीं भी होता है,
तुम्हारे साथ का हर लम्हा उसके रूबरू होता है।
वो जानता तो है कि छिपाना ज़रूरी तो नही है,
पर प्यार दिखाया ही जाये ये ज़रूरी तो नही है।
उसकी हर आदत में तुम आओगी नज़र,
ज़रा-सा ध्यान जो तुम दोगी उधर।
हर बार कैसे वो साथ देता है तुम्हारा,
चुप रह जाता है सुनकर नाम तुम्हारा।
उसका गुस्सा उसकी आँखों में उतर आता है,
जब भी कोई कुछ भी तुम्हे कह जाता है।
तुम शिकायतें उससे बार-बार करती हो,
उसके हर फैंसले को नज़रअंदाज़ करती हो।
वो तब खफ़ा हो जाने का दिखावा तो करता है,
लेकिन भीतर ही भीतर कहीं बहुत डरता है।
डरता है तुमको कहीं वो खो ना दे,
सम्भालता है खुद को, कहीं रो ना दे।
जाने कब समझोगी तुम कि हाँ प्यार उसको भी है,
जाने कब समझोगी तुम कि हाँ चाह उसको भी है।
वो छिपकर ही सही, पर सोचता है तुम्हे,
वो बिन कहे ही सही, पर कहता है तुम्हे।
उसकी आँखों में हर वो ज़ज़्बात होता है,
उसकी हरकतों में हर वो अंदाज़ होता है।
ऐसा नही है कि वो कहता नही है,
हाँ लबों पर उसके कुछ रहता नही है...

Thursday, 14 November 2019

काश...

कभी-कभी यूँ लगता है,
ज़िन्दगी जैसे मज़े ले रही हो हमारे!
ये है आका कोई ज़िद्दी,
और हम गुलाम कोई हों बेचारे!
चलाती है खुद की ही मर्ज़ी जैसे,
दिन अजीब से दिखा दिये कई ऐसे!
हमने कुछ और माँगा, इसने कुछ और दिया,
हमने कुछ और सोचा, इसने कुछ और किया!
हिसाब से हमारे कब चली है ये,
जाने अपने ही किसी रंग में ढली है ये!
जब लगा कि हाँ सब सही हो चला है,
उसी पल कोई मोड़ नया ले लिया इसने!
कभी ढ़ेर सारी खुशियाँ दे दी यूँ ही,
तो कभी ग़मों के बीच छोड़ दिया इसने!
कभी दर्द, आँसू, तकलीफें हज़ार दीं,
कभी यूँ ही दे कर रौशनी नज़र उतार ली!
कमाल के कई खेल, खेल लेती है कभी तो,
हाँ, पर कुछ तो ये ज़रूर देती है सभी को!
यूँ सब ठीक है, कोई शिकायत नही है,
ज़िन्दगी की ऐसी भी बुरी कोई आदत नही है!
पर कभी-कभी यूँ लगता है,
हाँ सच में यूँ लगता है,
काश, ज़िन्दगी ऐसी होती,
काश, ज़िन्दगी वैसी होती,
सारी हमारे हिसाब से ना सही,
कुछ तो लाज़वाब-सी होती!
काश...

Monday, 3 June 2019

एक प्याली चाय

एक प्याली चाय क्या कर सकती है? सोचिये। मुझे लगता है बहुत कुछ। लेकिन सिर्फ तभी जब आप चाय पीते हों। कोई वजह नही चाय पर कुछ लिखने की, बस यूँ ही मन किया तो सोचा क्यूँ ना इस एक प्याली चाय पर ही कुछ उलझे हुए रिश्तों को सुलझाया जाये, या यूँ कहिये कि ये देखा जाये कि ये एक प्याली क्या-क्या कर सकती है।

चलिये आगाज़ सुबह से करते हैं। दिन की शुरुआत और आज आप एक अलग ही रूप में हैं, रोज़ आपके लिए कोई और चाय बनाता है, मगर आज आप थोड़ा पहले उठे और आपने उनके लिये चाय बनाई, जो रोज़ आपके लिए चाय बनाते हैं, और वो कोई भी हो सकता है।

या फिर ऐसा भी हो सकता है कि आपके किसी दोस्त/सहकर्मी से आपका कोई मन-मुटाव हो गया है, अगर बन्दा/बन्दी चाय पीता/पीती है तो क्या हर्ज़ है एक प्याली चाय से इस मन-मुटाव को दूर करने में।

अच्छा ऐसा भी तो हो सकता है कि आज उन्हे वो बताते हैं जो पिछले एक महीने/एक साल से नही बताया, एक प्याली चाय की मुलाकात में क्यूँ ना एक कोशिश की जाये। हाँ रही तो शुक्रिया उस प्याली का, ना भी रही तो चाय तो पी ही लेंगे साथ में। सौदा बुरा भी नही है।

इस भागती ज़िन्दगी में हम इतने मशरूफ़ हैं कि साथ बैठकर दो पल गुफ़्तगू तक नही कर पाते हैं। चलिये क्यूँ ना आज एक चर्चा चाय पर ही हो जाये। क्या हर वक़्त खुद को रिश्तों से अलग रखना कभी-कभी उनमें उलझ कर भी देखा जाये। आख़िर कितना वक्त लेती है एक प्याली चाय? पर हाँ वक़्त देती बहुत है। यकीन ना आये तो एक कोशिश कर ही लीजिये।

शाम का वक़्त हो, बालकनी का नज़ारा हो, दूर तक दिखता हो आसमाँ और साथ में एक प्याली चाय, यहाँ आप उनसे मिल सकते हैं जिन्हें रोज़ आईने में देखते तो हैं आप पर शायद पहचान नही पाते हैं, या भूल गए हैं।

अब कहिये जनाब! क्या नही कर सकती है ये एक प्याली चाय।

"कुछ दूरियाँ, कुछ फाँसले मिटा सकती है,
ये एक प्याली चाय किसी को करीब ला सकती है...।"

Sunday, 2 June 2019

कभी सोचा है?

कभी-2 लगता है कि ऐसी बहुत-सी बातें हैं जिनके बारे में हम कभी सोचते ही नही हैं। पता नही सोचते नही हैं, या समय नही होता है, या फिर सोचना ही नही चाहते हैं। जो भी है पर हम सभी की ज़िन्दगी में ऐसा बहुत कुछ है जिस पर सोचना बहुत ज़रूरी है।

जैसे -
क्या हम आज जहाँ हैं , वहाँ हम खुश हैं?
क्या हम जो हैं, हमें वही होना था, हमें वही बनना था?
क्या आज जो भी हमारे पास है, हम वही चाहते थे?
क्या हम वही ज़िन्दगी जी रहे हैं, जैसी हमने सोची थी?

ये फ़ेहरिस्त बहुत लंबी है। सवाल ऐसे हज़ारों हैं, जवाब इसीलिए नही हैं क्यूँकि हमने कभी सोचा नही, या यूँ कहिये कि हम सोचना चाहते ही नही हैं। वज़ह जो भी हो मुद्दा ये है कि आख़िर ऐसे सवाल अगर हैं भी तो क्यूँ हैं और हम इनके बारे में सोचते क्यूँ नही हैं? ज़रूरी नही कि आप मेरी हर बात से इत्तेफ़ाक रखें। हाँ पर एक बात ज़रूर है कि इनमें से कोई ना कोई सवाल आपके ज़हन में भी कहीं छिपा होगा बस या तो वो कहीं दबा है या आपने शायद उसे दबा रखा है। और अगर ऐसा नही है तो यकीन मानिये आप बहुत खुशनसीब हैं। क्यूँकि ऐसी ज़िन्दगी नसीब वालों को ही मिलती है जिनकी ज़िन्दगी में ऐसा कोई सवाल ना हो।

हाँ अगर आप इन खुशनसीबों में से नही हैं तो यकीनन ऐसा कोई ना कोई सवाल आपके ज़हन में होना चाहिए। मेरा उद्देश्य बस इस बाबत बात करना है कि क्यूँ हम ऐसे किसी सवाल को टालते हैं, उस पर गौर नही करना चाहते हैं, क्यूँ हमारे दिल और दिमाग के बीच एक अजीब-सी रंजिश है, दिल कुछ चाहता है और दिमाग कुछ? क्यूँ हम जी तो रहे हैं पर शायद ये ज़िन्दगी, ज़िन्दगी जैसी नही है? ऐसे सवालों का क्या मतलब है? मैं चाहती हूँ कि हम सभी एक बार अपनी इस भागती-दौड़ती ज़िन्दगी में से थोड़ा समय निकालें और कभी, कहीं बैठकर ये सोचें-
"क्या आज हम जहाँ खड़े हैं, हम खुश हैं?
क्या हम वहाँ हैं, जहाँ हमें होना चाहिए था...?"

यकीन मानिये अगर इन सवालों के जवाब ना में हैं तो शायद हमें ज़रूरत है अपनी ज़िन्दगी में कुछ बदलने की। हमें ज़रूरत है खुद से मिलने की, वो करने की जो हम हमेशा से करना चाहते थे, वो कहने की जो हम हमेशा से कहना चाहते थे, वो बनने की जो हम हमेशा से बनना चाहते थे। हमें ज़रूरत है उस सपने को दोबारा जीने और देखने की जिसे अपनी जिम्मेदारियों के बोझ तले हमने कहीं दबा दिया है। हमें ज़रूरत है ज़िन्दगी को जीने की।

Sunday, 26 May 2019

एक छोटी-सी मुलाकात

हर कहानी की तरह ये कहानी भी कुछ अलग ही है। एक खूबसूरत सी शाम है, और भीड़ भरा एक बाज़ार है। ज़िन्दगी मानो यहाँ-वहाँ दौड़ रही है। और इसी भीड़ में कहीं टकराना है अश्क़ और नयन को। अश्क़ हमारी कहानी का नायक है और नयन है उसकी नायिका। अश्क़ इस शहर में अकेला रहता है और उसका परिवार रहता है बुलन्दशहर में। नयन इसी शहर की है और शहर है दिल्ली। जनपथ का बाज़ार ,जहाँ आपको क्या नही मिलेगा? बस यहीं उनकी किस्मत को भी आज मिलना है। जनपथ मानो एक गोल-मोल सी भूल-भुलैया है, कहीं बाज़ार तो कहीं बड़ी-बड़ी ईमारतें। बन्दा अगर यहाँ के रास्तों से वाकिफ़ ना हो तो समझो खो ही जायेगा। बस यहीं किसी रेड-लाइट पर रुकी है अश्क़ की कार। और ठीक उसके सामने से सड़क को पार करती निकलती है नयन। नही-नही अभी नही, ये मुलाकत अभी नही होगी। अब क्यूँकि अश्क़ इस भूल-भुलैया में खो गया है तो उसका आख़िरी सहारा गूगल मैप है, तो अपनी मंज़िल का मैप वह लगा चुका है और बढ़ चुका है नयन की ओर। और नयन भी उसी की ओर बढ़ रही है शायद। अचानक अश्क़ का फ़ोन बज उठता है और वहाँ से एक प्यारी सी आवाज़ आती है,"हेल्लो अश्क़ आप कितनी देर में पहुँचेंगे? मैं रिगल सिनेमा के पास पहुँच गई हूँ।" अश्क़,"मैं बस पाँच मिनट में आपके पास पहुँचने वाला हूँ।"
और पाँच मिनट के अंदर अश्क़ की कार रिगल सिनेमा के आगे रुकती है। भीड़ इतनी है कि यहाँ किसी जाने-पहचाने इंसान को भी पहचानना मुश्किल था और इस भीड़ में इन दोनों को एक-दूसरे को ढूँढना था। अश्क़ कार से बाहर आता है और किसी को फ़ोन लगाता है अचानक उसके कंधे पर कोई हाथ रखता है और जैसे ही वो मुड़ता है नयन उसके ठीक सामने खड़ी होती है। दोनों एक-दूसरे को पहचानने की कोशिश करते हैं। वैसे एक बात है कि मैट्रिमोनियल साइट्स से रिश्ता ढूँढ़कर यूँ मिलने आना किसी एडवेंचर से कम नही होता है। यूँ वो दोनों फ़ोन पर कई बार बात कर चुके हैं पर आमने-सामने की यह पहली मुलाक़ात है उनकी। फॉर्मल मेल-मिलाप के बाद ज़रूरी ये है कि कोई शांत जगह तलाश की जाये जहाँ बैठ कर कुछ बात की जा सके। तो तय ये होता है कि सी सी डी में बैठा जाये। अश्क़ वहाँ पहुँच कर कॉफ़ी आर्डर करता है और नयन का पहला वाक्य होता है,"हम बिल शेयर करेंगे, ओके?" अश्क़ हाँ में सिर हिला देता है। और फिर शुरू होता है बातों का सिलसिला। पहली बार अश्क़ को लगता है कि नयन बहुत बातूनी है और उसे चुप करवाना बहुत मुश्किल भी है, पर बोर नही कर रही है बल्कि उसकी आवाज़ कानों को एक सुकून सा दे रही है। उसका दाहिना हाथ बार-बार उसके दायें कान के झुमके को छूता है और बाएँ हाथ से वो अपनी झुल्फ़ों को बार-बार ठीक करती है जो हवा के कारण उसके चेहरे पर आ रही हैं। अचानक नयन को लगता है कि शायद सिर्फ़ वही बोले जा रही है और अश्क़ बिल्कुल चुप हो गया है तो वह अश्क़ को कहती है,"आप अपने बारे में बताईये कुछ?" अब अश्क़ को मौका मिला है बोलने का, पूछने का, कहने का, पर पता नही क्या हुआ है कि उसके सवाल-जवाब सब खत्म हो गए हैं। नयन को ये अजीब लग रहा है और एक ख्याल उसके मन में आ चुका है,"ये मुझे रिजेक्ट करने वाला है पक्का। ये कितना डूड टाइप बन्दा है और मैं एवरेज से भी कम, इसको क्यूँ पसन्द आऊँगी मैं? कहा भी था मैंने मम्मी से कि नही मिलना है मुझे। कहाँ ये और कहाँ मै? जोड़ी ही नही बनेगी। क्या सोचता होगा ये मेरे बारे में?" तभी कॉफी आ जाती है। और अश्क़ अभी भी चुप है। नयन ही जानती है कि अंदर ही अंदर उसे कैसे लग रहा है। अचानक अश्क़ पूछता है,"मैं रियलिटी में कैसा लगा आपको?" और नयन तपाक से जवाब देती है,"बहुत अच्छे।" और ऐसा कह कर वह शर्मा जाती है। बस यहाँ से शुरू हो ही जाती है एक फॉर्मल सी बातचीत। करीब एक घण्टा होने को है, कॉफ़ी पहले ही खत्म हो गई है। और जैसे ही नयन अपनी घड़ी की ओर देखती है, अश्क़ पूछ बैठता है,"चलें?" नयन हाँ में सिर हिला देती है। बाहर आकर अश्क़ पूछता है,"थोड़ी देर पालिका पार्क में घूमें?" नयन को ना कहने की कोई वजह नही दिखाई देती है तो वो हाँ कह देती है। यूँ एक घण्टा और निकल जाता है। अश्क़ पूछता है कि आपको देर हो जायेगी , चलिए चलते हैं। इस पर नयन कहती हैं,"नही में अभी मार्किट में रुकूँगी मुझे कुछ लेना है। आप चलिये।" नयन को यूँ अकेले छोड़ना अश्क़ को अच्छा नही लगता है तो वो भी साथ आने की ज़िद करता है। नयन की शॉपिंग और कुछ नही बल्कि झुमकों की ढेर सारी खरीदारी है। और पालिका है भी इस बात के लिए खूब प्रसिद्ध। बस अब हो ये रहा है कि नयन के हर झुमके के लिए आईना अश्क़ बना रहा है। और धीरे-धीरे वो उसके दिल में उतर रही है। अश्क़ को लगता है कि नयन को वहाँ अकेले ना छोड़ना बस यही एक फैंसला है जिस पर उसे सारी जिंदगी पछतावा नही होगा। क्यूँकि वो छोटी सी मुलाकात और वो हल्की-फुल्की शॉपिंग उसकी पूरी जिंदगी बनाने वाले थे।

वो कहते हैं ना,
"कभी-कभी एक मुलाकात भी ज़िन्दगी भर की ख़ुशियाँ दे जाती है और हमें वो मिल जाता है जिसको हम उम्र भर ढूँढते रहे हों...!"

Monday, 7 January 2019

ज़हर

ये कौन कहता है,
कि ज़हर सिर्फ़
बोतल में रहता है।
कभी देखा करो चहुँ ओर,
जो मिल जाये एक भी छोर।
जिसमें नफ़रत का ये विष ना हो,
कहीं कोई बेरहम साज़िश ना हो।
लोग बेताब रहते हैं,
लड़ने को, मरने को।
बातें बेहिसाब होती हैं,
मगर द्वेष में जलने की।
कोई किसी के चरित्र पर,
उठाता है उंगली।
कोई किसी को कह देता है
तुम हो निहायत जंगली।
यूँ अपने गिरेबाँ में वैसे
झाँकता भी कौन है।
खुद को किसी से कम
आँकता भी कौन है।
सभी धुन में हैं कि
चलो इसे नीचा दिखाया जाए।
आज फिर सर-ए-आम
तमाशा उसका बनाया जाए।
वाकई कमाल के हुनरबाज़ हैं हम
नफ़रतें फ़ैलाने में लगाते हैं सारा दम।
सोचो गर इसी ज़ज़्बे से मोहब्बत को
हमने गर बिखेरा होता।
जाने कितनी अंधेरी रातों में
आज उजला सवेरा होता।
जाने किस-किस की ज़िंदगी
फिर से आबाद हुई होती।
अफ़सोस ऐसा होता नही है,
ग़म में किसी के अब कोई रोता नही है।
इंतज़ार रहता है सबको कि
अब मौका मिलेगा, तब मौका मिलेगा।
ऐसा ही चलता रहा तो,
फूल भी नफ़रत का ही खिलेगा।
कोई कहीं से तो एक शुरुआत करे,
कोई किसी से एक दरख़्वास्त करे।
कि हाँ ये एक सच है
कि ज़हर शब्दों में भी होता है,
विचारों में भी होता है।
पर एक सच ये भी है
कि अमृत भी शब्दों में ही होता है,
विचारों में ही होता है।

एक मुलाकात

कितनी खूबसूरत शाम थी वो। विक्रम को एक अलग ही खुशी अनुभव हो रही थी आज। उसने तो कभी सपने में भी नही सोचा था कि यूँ अचानक इतने सालों बाद वो रिया से मिलेगा। और देखो वो टकराये भी तो कहाँ? उसी की बिल्डिंग की लिफ्ट में। उसे तो अभी तक लग रहा था जैसे उसने कोई खूबसूरत ख्वाब देखा हो और ऐसा लगे भी क्यूँ नही आखिर रिया कॉलेज के दिनों में सभी के लिए एक खूबसूरत ख्वाब ही तो थी।

पता नही क्यूँ रिया को अचानक सामने देखकर विक्रम को क्या हो गया कि उसके मुँह से एक शब्द नही निकला। वो तो अच्छा हुआ कि रिया ने खुद ही पहल की,"हे। यू आर विक्रम ना? डू यू रिमेंबर मी?" विक्रम के मन में ख्याल आया कि कह दूँ,"डू आई रिमेंबर यू? मैं , तुम्हे भूला ही कब था?" पर किसी तरह उसने खुद को सम्भाला और रिया की बात का जवाब दिया, मगर अपने ही ढ़ंग से। "सॉरी डू वी नो ईच अदर?" रिया ने तपाक से जवाब दिया,"अरे यार हम एक ही कॉलेज में पढ़ते थे ना।" विक्रम,"अरे तुम रिया हो ना। सॉरी पहचाना नही तुम्हे।"

बस फिर जो बातों का सिलसिला शुरू हुआ तो पता ही नही चला कि कब ग्राउंड फ्लोर आ गई और लिफ्ट का दरवाजा खुल गया। विक्रम को लगा जैसे किसी ने अचानक उसके सपनों के पंख तोड़ दिए हों। पर क्या कर सकते हैं लिफ्ट को तो रुकना ही था। अचानक उसे याद आया कि उसने रिया से ये तो पूछा ही नही कि वो यहाँ कैसे और क्यूँ मिली है उसे। तो अगले ही क्षण उसने रिया से पूछ लिया,"हे बाय दी वे, व्हाट आर यू डूइंग हियर?" और रिया भी मानो इसी सवाल की प्रतीक्षा में थी तो उसने कहा," अरे सॉरी बताना ही भूल गई। वो मैंने जॉब स्विच की है तो यहाँ नोएडा में जॉइन किया है। पर तुम यहाँ कैसे?" विक्रम ने तपाक से जवाब दिया,"मैं तो यहीं रहता हूँ, इसी बिल्डिंग के टेंथ फ्लोर पर।" रिया,"ओह, ग्रेट मैं और मेरी फैमिली एलेवेंथ फ्लोर पर शिफ़्ट हुए हैं। चलो अब तो मिलना-मिलाना होता रहेगा फिर।" विक्रम,"हाँ क्यूँ नही।"

और इस खूबसूरत मुलाकात को अपने ज़हन में बसाये विक्रम चल पड़ा अपने ऑफिस की तरफ। और सोचने लगा कि ये वक़्त भी कमाल की साज़िशें करता है। एक ज़माना था जब वो और रिया एक ही कॉलेज में थे और उनकी एक मुलाकात तक ना हो सकी कभी। और आज इतने सालों बाद एक बहुत ही खूबसूरत-सी मुलाकात जाने कहाँ से वक़्त ने उसके नसीब में डाल दी। एक छोटी पर यादगार मुलाकात।