Thursday, 23 April 2015

ख़्वाबों की उड़ान


कहते हैं,"हर किसी को मुक्कमल जहान नही मिलता, किसी को ज़मीन, तो किसी को आसमान नही मिलता...!"

ये पंक्ति ना जाने कितनी ही बार सुनी होगी आपने, और शायद ना जाने कितनी ही बार इसका इस्तेमाल भी किया होगा। पर एक बात जो यहाँ गौर करने वाली है, वो ये है कि क्या सच में हर किसी को वो नही मिल पाता है जिसकी उसने चाहत की होती है? क्या हर इंसान के सारे सपने पूरे नही हो पाते हैं? 

आगे पढ़ने या आगे बढ़ने से पहले एक सवाल पूछिये खुद से एक बार कि क्या कभी ऐसा हुआ कि मेरा कोई सपना पूरा नही हो पाया? क्या कभी मेरे किसी सपने की उड़ान बीच में ही रुक गई, या रोक दी गई? क्या कभी मेरे ख़्वाबों के परों को कुतर दिया गया? क्या कभी मैंने खुद ही अपने सपनों का गला घोंटा? क्या कभी मेरी जिम्मेदारियाँ मेरे सपनों के रास्ते में आई? क्या कभी मेरे अपनों के सपनों के लिए मैंने अपने सपने के बलि दी? अगर इनमें से किसी भी एक सवाल का जवाब आप हाँ में देते हैं तो बेशक़ आप आगे पढ़िये। :-)

मैं एक बात यहाँ साफ़ कर देना चाहती हूँ कि मैं किसी के लिए कोई प्रेरणास्रोत नही रही हूँ, हाँ लेकिन मेरे कुछ दोस्तों को, पता नही कैसे, पर ये लगता है कि कभी-कभी मेरे कुछ शब्द उनकी मायूस ज़िन्दगी में उम्मीद की किरणें जगा जाते हैं। बस अब ये कहिये की उनके मुझे इस तरह चने के झाड़ पर चढ़ा देने का ही नतीज़ा है या कि कुछ और मैं हर समय कोशिश करती रहती हूँ कि कुछ ना कुछ ऐसा ज़रूर लिखूँ जो किसी ना किसी को कोई उम्मीद दे या एक किरण ही दिखा दे रोशनी की। तो आज इस लेख को लिखने का उद्देश्य भी कुछ ऐसा ही है मेरा।

आप ज़रा एक बात पर ग़ौर कीजिये कि आपका ऐसा कोई ना कोई ख़्वाब ज़रूर होगा जो ऊपर दिये गये कारणों के कारण अधूरा रह गया होगा। जिसकी उड़ान बीच में ही रुक गई होगी। ऐसे बहुत से ख़्वाब होते हैं। आमतौर पर हर इंसान ऐसे बहुत से ख़्वाब अपनी आँखों में सजाये रहता है पर समाज की जंजीरें उसे अपनी गिरफ़्त में कुछ यूँ बाँधें रखती हैं कि वो चाहकर भी अपने सपनों की उड़ान पूरी नही कर पाता है। मैं ये नही कह रही हूँ कि आप समाज को भूल कर वो कीजिये जो आप चाहते हैं। नही ऐसा तो कतई सम्भव नही। पर हाँ एक बात जो मैं यहाँ लिखना चाहूँगी वो ये है कि क्या ये सम्भव नही कि आप समाज में अपनी भूमिका भी निभाते जायें और अपने सपनों के परों को ना कुतर कर उनकी उड़ान को भी जारी रखें।

आपको लगेगा ये असम्भव सी बात है। तो मैं यहाँ बस यही लिखूँगी-

"हम मनुष्य उस सर्वशक्तिमान ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृत्ति हैं, हम वो हैं जो सागर की अथाह गहराई को नाप चुके हैं, हम वो हैं जो आसमान का सीना चीर उसकी ऊँचाई को भाप चुके हैं, हम वो हैं जो गिर कर सिर्फ़ उठते नही हैं बल्कि खड़े हो जाते हैं, हम वो हैं जो हार कर थकते नही हैं बल्कि जीत को गले लगाते हैं। फिर समाज और ज़िन्दगी की ज़रा-सी बन्दिशें हमारे सपनों की उड़ान को कैसे रोक पायेंगी भला?"

2 comments:

  1. बहुत बढ़िया प्रस्तुति...आत्मविश्वास के बल पर ही इन्सान आगे बढ़ सकता है .

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    1. "शुक्रिया ज्योति Mam...!" :-)

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