Tuesday, 8 July 2014

माफ़ कीजिये...पर मैं नमक नही...!

अगर इस शीर्षक को पढ़ कर आपको थोड़ा अजीब लग रहा है तो माफ़ कीजिये आप बिल्कुल भी गलत नही हैं. पर हाँ थोड़ा सब्र रखिये, फिर आप जान ही जायेंगे कि आख़िर मैंने ऐसा शीर्षक रखा ही क्यूँ? नमक, रोजमर्रा के हमारे मसालों में से एक मसाला, लेकिन शायद सबसे ज़रूरी वाला. आख़िर क्या ख़ास है इसमें ऐसा, आख़िर क्यूँ ये इतना महत्त्वपूर्ण है?
कभी सोचा है आपने कि नमक ही एक ऐसा मसाला है जो आसानी से घुल जाया करता है वो भी हर चीज़ में. अपना रंग, अपनी पहचान सब खो देता है, जिसमें मिलाया उस जैसा हो गया. है ना कितना ख़ास ये मसाला. और फिर ये सिर्फ मसाला भी तो नही, प्रकृत्ति ने जाने और क्या-क्या काम सौंप रखे हैं इसे. पर मेरा इरादा यहाँ उन सब बातों का ज़िक्र करना कतई नही है.
मैं नमक की बात क्यूँ कर रही हूँ? आखिर क्यूँ मैं नमक नही. जरा सोचिये एक बार, नमक आसानी से घुल जाता है, बिना कुछ कहे, बिना कोई शिकायत किये. क्या आप ऐसे हैं? आपके आस-पास के जो हालात हैं, जो लोग हैं आपके आस-पास, क्या आप उन हालातों, उन लोगों के बीच घुल गए हैं? क्या आप वो हो गए हैं जैसा वो आपको चाहते हैं, क्या आप अपना अस्तित्त्व खो चुके हैं? जरा सोचिये एक बार. कोशिश कीजिये खुद को नमक जैसा ना होने देने की. नमक एक मसाला है, और शायद इसके अलावा भी इसके कई रूप, कई काम हैं, लेकिन क्या हम महज़ एक मसाला हैं? नही ना?
ज़रूरी नही कि आपके विचार मेरे विचारों से मेल खायें. लेकिन हाँ, एक बात तो हम सभी जानते हैं कि हम मनुष्य ईश्वर की बनाई हुई सभी कृतियों में शायद सबसे बेहतर ही हैं. और अगर ऐसा है तो हमें कोई हक नही उस ईश्वरकी कला का निरादर करने का. आपका हालातों से समझौता करना, और किसी के सामने अपने स्वाभिमान को गिरवी रखना ठीक वैसे ही होगा जैसा कि नमक का किसी द्रव्य में घुल कर खुद को खो देना. वैसे ये ज़रूरी नही कि इसे आप एक अवगुण की तरह ही देखें. सोचिये एक बार कि आप सबसे घुल मिल कर रहते हैं बिल्कुल नमक की तरह, तो ये एक गुण है ना कि अवगुण. लेकिन आज जिस युग में हम जी रहे हैं, वहाँ ऐसा होना थोड़ा नामुमकिन सा लगता है. कलयुग कहिये, या घोर कलयुग, इस युग में नमक हो जाना शायद आपके स्वाभिमान के लिए हानिकारक हो सकता है. इसीलिए माफ़ कीजिये...पर मैं नमक नही...!

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