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Thursday, 25 December 2014

यादें

छाई हैं बादलों-सी,
ज़िन्दगी के आसमान पर।
कभी गिरती हैं बारिश की बूँदों-सी,
तपती ज़मीन पर।
कभी बहा ले जाती हैं बाढ़-सी,
करती सब तितर-बितर।
कभी देती हैं राहत
आज की तकलीफों से।
कभी देती हैं तकलीफ़
कल की राहतों से।
कभी कर देती हैं तन्हा
महफ़िल में भी।
कभी बन जाती हैं साथी
तन्हाई में ही।
कभी हैं छिपा हुआ खजाना-सा,
कभी हैं ज़ख्म कोई पुराना-सा।
ये यादें भी अजीब हैं यारों,
कभी रुला देती हैं,
कभी हँसा देती हैं।
कभी बहुत कुछ बना देती हैं,
कभी सब कुछ मिटा देती हैं।

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