Saturday, 13 June 2020
लिखने बैठे...तो सोचा...
Tuesday, 31 March 2020
काश! फिर वही काश
Tuesday, 14 January 2020
ऐसा नही है कि वो कहता नही है...
Thursday, 14 November 2019
काश...
Monday, 3 June 2019
एक प्याली चाय
एक प्याली चाय क्या कर सकती है? सोचिये। मुझे लगता है बहुत कुछ। लेकिन सिर्फ तभी जब आप चाय पीते हों। कोई वजह नही चाय पर कुछ लिखने की, बस यूँ ही मन किया तो सोचा क्यूँ ना इस एक प्याली चाय पर ही कुछ उलझे हुए रिश्तों को सुलझाया जाये, या यूँ कहिये कि ये देखा जाये कि ये एक प्याली क्या-क्या कर सकती है।
चलिये आगाज़ सुबह से करते हैं। दिन की शुरुआत और आज आप एक अलग ही रूप में हैं, रोज़ आपके लिए कोई और चाय बनाता है, मगर आज आप थोड़ा पहले उठे और आपने उनके लिये चाय बनाई, जो रोज़ आपके लिए चाय बनाते हैं, और वो कोई भी हो सकता है।
या फिर ऐसा भी हो सकता है कि आपके किसी दोस्त/सहकर्मी से आपका कोई मन-मुटाव हो गया है, अगर बन्दा/बन्दी चाय पीता/पीती है तो क्या हर्ज़ है एक प्याली चाय से इस मन-मुटाव को दूर करने में।
अच्छा ऐसा भी तो हो सकता है कि आज उन्हे वो बताते हैं जो पिछले एक महीने/एक साल से नही बताया, एक प्याली चाय की मुलाकात में क्यूँ ना एक कोशिश की जाये। हाँ रही तो शुक्रिया उस प्याली का, ना भी रही तो चाय तो पी ही लेंगे साथ में। सौदा बुरा भी नही है।
इस भागती ज़िन्दगी में हम इतने मशरूफ़ हैं कि साथ बैठकर दो पल गुफ़्तगू तक नही कर पाते हैं। चलिये क्यूँ ना आज एक चर्चा चाय पर ही हो जाये। क्या हर वक़्त खुद को रिश्तों से अलग रखना कभी-कभी उनमें उलझ कर भी देखा जाये। आख़िर कितना वक्त लेती है एक प्याली चाय? पर हाँ वक़्त देती बहुत है। यकीन ना आये तो एक कोशिश कर ही लीजिये।
शाम का वक़्त हो, बालकनी का नज़ारा हो, दूर तक दिखता हो आसमाँ और साथ में एक प्याली चाय, यहाँ आप उनसे मिल सकते हैं जिन्हें रोज़ आईने में देखते तो हैं आप पर शायद पहचान नही पाते हैं, या भूल गए हैं।
अब कहिये जनाब! क्या नही कर सकती है ये एक प्याली चाय।
"कुछ दूरियाँ, कुछ फाँसले मिटा सकती है,
ये एक प्याली चाय किसी को करीब ला सकती है...।"
Sunday, 2 June 2019
कभी सोचा है?
कभी-2 लगता है कि ऐसी बहुत-सी बातें हैं जिनके बारे में हम कभी सोचते ही नही हैं। पता नही सोचते नही हैं, या समय नही होता है, या फिर सोचना ही नही चाहते हैं। जो भी है पर हम सभी की ज़िन्दगी में ऐसा बहुत कुछ है जिस पर सोचना बहुत ज़रूरी है।
जैसे -
क्या हम आज जहाँ हैं , वहाँ हम खुश हैं?
क्या हम जो हैं, हमें वही होना था, हमें वही बनना था?
क्या आज जो भी हमारे पास है, हम वही चाहते थे?
क्या हम वही ज़िन्दगी जी रहे हैं, जैसी हमने सोची थी?
ये फ़ेहरिस्त बहुत लंबी है। सवाल ऐसे हज़ारों हैं, जवाब इसीलिए नही हैं क्यूँकि हमने कभी सोचा नही, या यूँ कहिये कि हम सोचना चाहते ही नही हैं। वज़ह जो भी हो मुद्दा ये है कि आख़िर ऐसे सवाल अगर हैं भी तो क्यूँ हैं और हम इनके बारे में सोचते क्यूँ नही हैं? ज़रूरी नही कि आप मेरी हर बात से इत्तेफ़ाक रखें। हाँ पर एक बात ज़रूर है कि इनमें से कोई ना कोई सवाल आपके ज़हन में भी कहीं छिपा होगा बस या तो वो कहीं दबा है या आपने शायद उसे दबा रखा है। और अगर ऐसा नही है तो यकीन मानिये आप बहुत खुशनसीब हैं। क्यूँकि ऐसी ज़िन्दगी नसीब वालों को ही मिलती है जिनकी ज़िन्दगी में ऐसा कोई सवाल ना हो।
हाँ अगर आप इन खुशनसीबों में से नही हैं तो यकीनन ऐसा कोई ना कोई सवाल आपके ज़हन में होना चाहिए। मेरा उद्देश्य बस इस बाबत बात करना है कि क्यूँ हम ऐसे किसी सवाल को टालते हैं, उस पर गौर नही करना चाहते हैं, क्यूँ हमारे दिल और दिमाग के बीच एक अजीब-सी रंजिश है, दिल कुछ चाहता है और दिमाग कुछ? क्यूँ हम जी तो रहे हैं पर शायद ये ज़िन्दगी, ज़िन्दगी जैसी नही है? ऐसे सवालों का क्या मतलब है? मैं चाहती हूँ कि हम सभी एक बार अपनी इस भागती-दौड़ती ज़िन्दगी में से थोड़ा समय निकालें और कभी, कहीं बैठकर ये सोचें-
"क्या आज हम जहाँ खड़े हैं, हम खुश हैं?
क्या हम वहाँ हैं, जहाँ हमें होना चाहिए था...?"
यकीन मानिये अगर इन सवालों के जवाब ना में हैं तो शायद हमें ज़रूरत है अपनी ज़िन्दगी में कुछ बदलने की। हमें ज़रूरत है खुद से मिलने की, वो करने की जो हम हमेशा से करना चाहते थे, वो कहने की जो हम हमेशा से कहना चाहते थे, वो बनने की जो हम हमेशा से बनना चाहते थे। हमें ज़रूरत है उस सपने को दोबारा जीने और देखने की जिसे अपनी जिम्मेदारियों के बोझ तले हमने कहीं दबा दिया है। हमें ज़रूरत है ज़िन्दगी को जीने की।
Sunday, 26 May 2019
एक छोटी-सी मुलाकात
हर कहानी की तरह ये कहानी भी कुछ अलग ही है। एक खूबसूरत सी शाम है, और भीड़ भरा एक बाज़ार है। ज़िन्दगी मानो यहाँ-वहाँ दौड़ रही है। और इसी भीड़ में कहीं टकराना है अश्क़ और नयन को। अश्क़ हमारी कहानी का नायक है और नयन है उसकी नायिका। अश्क़ इस शहर में अकेला रहता है और उसका परिवार रहता है बुलन्दशहर में। नयन इसी शहर की है और शहर है दिल्ली। जनपथ का बाज़ार ,जहाँ आपको क्या नही मिलेगा? बस यहीं उनकी किस्मत को भी आज मिलना है। जनपथ मानो एक गोल-मोल सी भूल-भुलैया है, कहीं बाज़ार तो कहीं बड़ी-बड़ी ईमारतें। बन्दा अगर यहाँ के रास्तों से वाकिफ़ ना हो तो समझो खो ही जायेगा। बस यहीं किसी रेड-लाइट पर रुकी है अश्क़ की कार। और ठीक उसके सामने से सड़क को पार करती निकलती है नयन। नही-नही अभी नही, ये मुलाकत अभी नही होगी। अब क्यूँकि अश्क़ इस भूल-भुलैया में खो गया है तो उसका आख़िरी सहारा गूगल मैप है, तो अपनी मंज़िल का मैप वह लगा चुका है और बढ़ चुका है नयन की ओर। और नयन भी उसी की ओर बढ़ रही है शायद। अचानक अश्क़ का फ़ोन बज उठता है और वहाँ से एक प्यारी सी आवाज़ आती है,"हेल्लो अश्क़ आप कितनी देर में पहुँचेंगे? मैं रिगल सिनेमा के पास पहुँच गई हूँ।" अश्क़,"मैं बस पाँच मिनट में आपके पास पहुँचने वाला हूँ।"
और पाँच मिनट के अंदर अश्क़ की कार रिगल सिनेमा के आगे रुकती है। भीड़ इतनी है कि यहाँ किसी जाने-पहचाने इंसान को भी पहचानना मुश्किल था और इस भीड़ में इन दोनों को एक-दूसरे को ढूँढना था। अश्क़ कार से बाहर आता है और किसी को फ़ोन लगाता है अचानक उसके कंधे पर कोई हाथ रखता है और जैसे ही वो मुड़ता है नयन उसके ठीक सामने खड़ी होती है। दोनों एक-दूसरे को पहचानने की कोशिश करते हैं। वैसे एक बात है कि मैट्रिमोनियल साइट्स से रिश्ता ढूँढ़कर यूँ मिलने आना किसी एडवेंचर से कम नही होता है। यूँ वो दोनों फ़ोन पर कई बार बात कर चुके हैं पर आमने-सामने की यह पहली मुलाक़ात है उनकी। फॉर्मल मेल-मिलाप के बाद ज़रूरी ये है कि कोई शांत जगह तलाश की जाये जहाँ बैठ कर कुछ बात की जा सके। तो तय ये होता है कि सी सी डी में बैठा जाये। अश्क़ वहाँ पहुँच कर कॉफ़ी आर्डर करता है और नयन का पहला वाक्य होता है,"हम बिल शेयर करेंगे, ओके?" अश्क़ हाँ में सिर हिला देता है। और फिर शुरू होता है बातों का सिलसिला। पहली बार अश्क़ को लगता है कि नयन बहुत बातूनी है और उसे चुप करवाना बहुत मुश्किल भी है, पर बोर नही कर रही है बल्कि उसकी आवाज़ कानों को एक सुकून सा दे रही है। उसका दाहिना हाथ बार-बार उसके दायें कान के झुमके को छूता है और बाएँ हाथ से वो अपनी झुल्फ़ों को बार-बार ठीक करती है जो हवा के कारण उसके चेहरे पर आ रही हैं। अचानक नयन को लगता है कि शायद सिर्फ़ वही बोले जा रही है और अश्क़ बिल्कुल चुप हो गया है तो वह अश्क़ को कहती है,"आप अपने बारे में बताईये कुछ?" अब अश्क़ को मौका मिला है बोलने का, पूछने का, कहने का, पर पता नही क्या हुआ है कि उसके सवाल-जवाब सब खत्म हो गए हैं। नयन को ये अजीब लग रहा है और एक ख्याल उसके मन में आ चुका है,"ये मुझे रिजेक्ट करने वाला है पक्का। ये कितना डूड टाइप बन्दा है और मैं एवरेज से भी कम, इसको क्यूँ पसन्द आऊँगी मैं? कहा भी था मैंने मम्मी से कि नही मिलना है मुझे। कहाँ ये और कहाँ मै? जोड़ी ही नही बनेगी। क्या सोचता होगा ये मेरे बारे में?" तभी कॉफी आ जाती है। और अश्क़ अभी भी चुप है। नयन ही जानती है कि अंदर ही अंदर उसे कैसे लग रहा है। अचानक अश्क़ पूछता है,"मैं रियलिटी में कैसा लगा आपको?" और नयन तपाक से जवाब देती है,"बहुत अच्छे।" और ऐसा कह कर वह शर्मा जाती है। बस यहाँ से शुरू हो ही जाती है एक फॉर्मल सी बातचीत। करीब एक घण्टा होने को है, कॉफ़ी पहले ही खत्म हो गई है। और जैसे ही नयन अपनी घड़ी की ओर देखती है, अश्क़ पूछ बैठता है,"चलें?" नयन हाँ में सिर हिला देती है। बाहर आकर अश्क़ पूछता है,"थोड़ी देर पालिका पार्क में घूमें?" नयन को ना कहने की कोई वजह नही दिखाई देती है तो वो हाँ कह देती है। यूँ एक घण्टा और निकल जाता है। अश्क़ पूछता है कि आपको देर हो जायेगी , चलिए चलते हैं। इस पर नयन कहती हैं,"नही में अभी मार्किट में रुकूँगी मुझे कुछ लेना है। आप चलिये।" नयन को यूँ अकेले छोड़ना अश्क़ को अच्छा नही लगता है तो वो भी साथ आने की ज़िद करता है। नयन की शॉपिंग और कुछ नही बल्कि झुमकों की ढेर सारी खरीदारी है। और पालिका है भी इस बात के लिए खूब प्रसिद्ध। बस अब हो ये रहा है कि नयन के हर झुमके के लिए आईना अश्क़ बना रहा है। और धीरे-धीरे वो उसके दिल में उतर रही है। अश्क़ को लगता है कि नयन को वहाँ अकेले ना छोड़ना बस यही एक फैंसला है जिस पर उसे सारी जिंदगी पछतावा नही होगा। क्यूँकि वो छोटी सी मुलाकात और वो हल्की-फुल्की शॉपिंग उसकी पूरी जिंदगी बनाने वाले थे।
वो कहते हैं ना,
"कभी-कभी एक मुलाकात भी ज़िन्दगी भर की ख़ुशियाँ दे जाती है और हमें वो मिल जाता है जिसको हम उम्र भर ढूँढते रहे हों...!"
Monday, 7 January 2019
ज़हर
ये कौन कहता है,
कि ज़हर सिर्फ़
बोतल में रहता है।
कभी देखा करो चहुँ ओर,
जो मिल जाये एक भी छोर।
जिसमें नफ़रत का ये विष ना हो,
कहीं कोई बेरहम साज़िश ना हो।
लोग बेताब रहते हैं,
लड़ने को, मरने को।
बातें बेहिसाब होती हैं,
मगर द्वेष में जलने की।
कोई किसी के चरित्र पर,
उठाता है उंगली।
कोई किसी को कह देता है
तुम हो निहायत जंगली।
यूँ अपने गिरेबाँ में वैसे
झाँकता भी कौन है।
खुद को किसी से कम
आँकता भी कौन है।
सभी धुन में हैं कि
चलो इसे नीचा दिखाया जाए।
आज फिर सर-ए-आम
तमाशा उसका बनाया जाए।
वाकई कमाल के हुनरबाज़ हैं हम
नफ़रतें फ़ैलाने में लगाते हैं सारा दम।
सोचो गर इसी ज़ज़्बे से मोहब्बत को
हमने गर बिखेरा होता।
जाने कितनी अंधेरी रातों में
आज उजला सवेरा होता।
जाने किस-किस की ज़िंदगी
फिर से आबाद हुई होती।
अफ़सोस ऐसा होता नही है,
ग़म में किसी के अब कोई रोता नही है।
इंतज़ार रहता है सबको कि
अब मौका मिलेगा, तब मौका मिलेगा।
ऐसा ही चलता रहा तो,
फूल भी नफ़रत का ही खिलेगा।
कोई कहीं से तो एक शुरुआत करे,
कोई किसी से एक दरख़्वास्त करे।
कि हाँ ये एक सच है
कि ज़हर शब्दों में भी होता है,
विचारों में भी होता है।
पर एक सच ये भी है
कि अमृत भी शब्दों में ही होता है,
विचारों में ही होता है।
एक मुलाकात
कितनी खूबसूरत शाम थी वो। विक्रम को एक अलग ही खुशी अनुभव हो रही थी आज। उसने तो कभी सपने में भी नही सोचा था कि यूँ अचानक इतने सालों बाद वो रिया से मिलेगा। और देखो वो टकराये भी तो कहाँ? उसी की बिल्डिंग की लिफ्ट में। उसे तो अभी तक लग रहा था जैसे उसने कोई खूबसूरत ख्वाब देखा हो और ऐसा लगे भी क्यूँ नही आखिर रिया कॉलेज के दिनों में सभी के लिए एक खूबसूरत ख्वाब ही तो थी।
पता नही क्यूँ रिया को अचानक सामने देखकर विक्रम को क्या हो गया कि उसके मुँह से एक शब्द नही निकला। वो तो अच्छा हुआ कि रिया ने खुद ही पहल की,"हे। यू आर विक्रम ना? डू यू रिमेंबर मी?" विक्रम के मन में ख्याल आया कि कह दूँ,"डू आई रिमेंबर यू? मैं , तुम्हे भूला ही कब था?" पर किसी तरह उसने खुद को सम्भाला और रिया की बात का जवाब दिया, मगर अपने ही ढ़ंग से। "सॉरी डू वी नो ईच अदर?" रिया ने तपाक से जवाब दिया,"अरे यार हम एक ही कॉलेज में पढ़ते थे ना।" विक्रम,"अरे तुम रिया हो ना। सॉरी पहचाना नही तुम्हे।"
बस फिर जो बातों का सिलसिला शुरू हुआ तो पता ही नही चला कि कब ग्राउंड फ्लोर आ गई और लिफ्ट का दरवाजा खुल गया। विक्रम को लगा जैसे किसी ने अचानक उसके सपनों के पंख तोड़ दिए हों। पर क्या कर सकते हैं लिफ्ट को तो रुकना ही था। अचानक उसे याद आया कि उसने रिया से ये तो पूछा ही नही कि वो यहाँ कैसे और क्यूँ मिली है उसे। तो अगले ही क्षण उसने रिया से पूछ लिया,"हे बाय दी वे, व्हाट आर यू डूइंग हियर?" और रिया भी मानो इसी सवाल की प्रतीक्षा में थी तो उसने कहा," अरे सॉरी बताना ही भूल गई। वो मैंने जॉब स्विच की है तो यहाँ नोएडा में जॉइन किया है। पर तुम यहाँ कैसे?" विक्रम ने तपाक से जवाब दिया,"मैं तो यहीं रहता हूँ, इसी बिल्डिंग के टेंथ फ्लोर पर।" रिया,"ओह, ग्रेट मैं और मेरी फैमिली एलेवेंथ फ्लोर पर शिफ़्ट हुए हैं। चलो अब तो मिलना-मिलाना होता रहेगा फिर।" विक्रम,"हाँ क्यूँ नही।"
और इस खूबसूरत मुलाकात को अपने ज़हन में बसाये विक्रम चल पड़ा अपने ऑफिस की तरफ। और सोचने लगा कि ये वक़्त भी कमाल की साज़िशें करता है। एक ज़माना था जब वो और रिया एक ही कॉलेज में थे और उनकी एक मुलाकात तक ना हो सकी कभी। और आज इतने सालों बाद एक बहुत ही खूबसूरत-सी मुलाकात जाने कहाँ से वक़्त ने उसके नसीब में डाल दी। एक छोटी पर यादगार मुलाकात।
Saturday, 13 October 2018
वक़्त सही तो सब सही...
सब सही होता है,
जब वक़्त सही होता है!
ना किसी का डाँटना अखरता है,
ना फटकारना बुरा लगता है!
हो सही गर वक़्त तो,
विष भी सुधा लगता है!
बात गहरी है, ज़रा कड़वी है,
के हालात, बताते हैं औकात!
हो बुरा जो वक़्त किसी का,
तो अच्छा हर काम बुरा लगता है!
मज़बूरी किसी की बहाना लगती है,
बातें अच्छी भी ताना लगती हैं!
कहते हैं इंसान कहाँ बदलते हैं,
बदल तो वक़्त जाता है!
इस वक़्त के खेल बड़े निराले हैं,
कहीं दिन में अंधेरा है, कहीं रात में उजाले हैं!
साजिशें हैं या के परखने के ये तरीके हैं,
हर पल एक नई तस्वीर दिखाता है!
वक़्त इंसान की असली औकात बताता है,
हो बुरा, या अच्छा, ये तो एक सीख सिखाता है!
Friday, 1 June 2018
ठहराव
था ठहरा सब कुछ,
जाने कितने दिनों से।
जड़ता जाने ये कैसी थी,
थी भी कहीं या नही थी।
ना शब्द मिले, ना कलम चली,
ज़िन्दगी थमी, पर रुकी नही।
कुछ लिखने को ना था,
बात ये भी बिल्कुल ना थी।
मन में मन के ख़्याल थे,
ज़िन्दगी के उलझे सवाल थे।
वक़्त की ना थी कमी कोई,
मैं ही थी शायद कहीं खोई।
हाँ शायद पहचाना है खुद को,
इन दिनों बहुत जाना है खुद को।
ज़ाया कुछ भी यूँ ही कहाँ गया,
समझो वक़्त ने मुझे थोड़ा वक़्त दिया।
ठहराव था एक ये ज़िन्दगी का,
बदलाव था एक ये ज़िन्दगी का।
अब जो उठा ली है ये कलम,
रुकना कहाँ है, मुझे पता नही।
Sunday, 28 February 2016
भीड़
कभी पास से गुज़र गई,
और कभी साथ खड़ी हुई,
चेहरों पे चेहरों को लपेटे,
खुद में कितने भाव समेटे,
कभी इस राह पर,
तो कभी उस राह पर,
बिना रुके, बिना थके,
उमड़ आती तूफ़ान-सी,
कभी बचपन-सी मासूम,
कभी बुढ़ापे-सी बेबस,
कहीं मिलते हंसों के जोड़े हैं,
कहीं लड़ते बेमतलब से मोहरे हैं,
लबों पे थोपे हुए एक नकली हँसी,
दबाये हुए सीने में अपने राज़ कईं,
जाने क्यों ये कभी रूकती नही,
जाने क्यों ये कभी ठहरती नही,
अजनबी-सी कभी,
तो कभी अपनी-सी,
मेरे साथ बढ़ती,
मेरे साथ चलती,
ये भीड़ होकर भी,
है महफ़िल तन्हा लोगों की|
Tuesday, 18 August 2015
आशायें...
अँधेरे रास्तों में,
बनके रोशनी-सी।
फीके जीवन में,
घुलके चाशनी-सी।।
कभी मंज़िल के निशाँ,
कभी दिल के अरमाँ।
कभी कोई ख़्वाब,
कभी कोई जवाब।।
टूटते को जोड़ गई,
भरम को तोड़ गई।
बिखरते को समेट गई,
ख्यालों में लपेट गई।।
चाहतों को ज़िंदा करके,
मुश्किलों को शर्मिन्दा करके।
हौंसलों को सख़्त करके,
सर्द रातों को तप्त करके।।
तन्हाईयों में दोस्त जैसी,
बेचैनियों में राहत जैसी।
दर्द में मलहम जैसी,
दिल की धड़कन जैसी।।
निराशाओं से उभारती,
ज़िन्दगी को सँवारती।
गिरते को सम्भालती,
हर डर से निकालती।।
अधूरी ज़िन्दगी में,
पूरी ज़िन्दगी ले आई।
ये आशायें ज़रा देखो तो,
बनके क्या-क्या ना आई।।
Wednesday, 24 June 2015
Different Faces of a Father
1) The Father
He is playing a father's role when he is holding your hand and helping you to take the first step of your life as a child. He ia playing a father when he let you enjoy a horse ride on his back. He is a father when he holds your hand firmly in his own hand and let you feel the warmth of his hand.
2) The Friend
He is playing a friend when he is playing cricket with you or when he is running madly in the lawn. When he is breaking the window glasses of the neighbors with you at that very moment he is a friend to you. When he clings to you in your bad days he is your friend.
Friday, 19 June 2015
कुछ ख़्याल मेरे बिखरे से...
याद नही कब से,
पर लिखने का शौंक है मुझे।
कभी कागजों पर,
कभी कापियों पर।
यूँ बहुत कुछ,
लिख चुकी हूँ मैं।
ना मिला कुछ तो,
किसी फटे तन्हा पन्ने पर।
काली स्याही में तो,
कभी लाल रंग में डुबो कर।
कभी एक पंक्ति में,
कभी एक शब्द में।
अपने लिए भी लिखा,
लिखा किसी ख़ास के लिए भी।
महफ़िल पर, तन्हाई पर,
इश्क़ पर, रुसवाई पर।
गुस्से पे काबू पाने को,
तो कभी किसी को जलाने को।
भाषा कभी ईशारों की थी,
तो थी कभी व्यंग्य की।
होकर बेबाक लिखा,
सोचकर बिंदास लिखा।
शब्दों को तोड़ा-मरोड़ा,
जज़्बातों को जमकर निचोड़ा।
लिख कर मिटाया बहुत बार,
कागज़ों को जलाया बहुत बार।
किसी को शिकायत रही,
तो कोई तारीफ़ करने लगा।
कोई कहने लगा पागल हो,
कोई बोला, डूबते का साहिल हो।
मुझसे शिकायत है बहुतों को,
मुझसे कोई शिकवा भी है।
यूँ साथ है दुनिया,
पर 'मन' कहीं तन्हा भी है।
मेरे शब्दों में छिपा है,
बहुत कुछ मुझसे जुड़ा।
यूँ कहानी मैंने अपनी,
आज तक कहीं लिखी नही।
पर मेरे दिल की तस्वीर,
मेरे शब्दों में क्या दिखी नही?
मैं वही हूँ जो बताते हैं शब्द मेरे,
मैं वही हूँ जो दिखाते हैं शब्द मेरे।
यूँ लिखती रहूँगी,
आख़िर शौंक है लिखना मेरा।
जड़ होते इस 'मन' को,
शब्द ही देते जान हैं।
यूँ देह चलती-फिरती है,
शब्द फूँकते इनमें प्राण हैं।
बहुत कुछ लिख चुकी हूँ,
बहुत कुछ लिखूँगी अभी।
हैं बहुत से ज़ज़्बात,
जो शब्दों में कभी उतरे ही नही।
अब सोचती हूँ एक दिन,
सम्भाल लूँ ज़रा उन्हे भी।
रख दूँ उठा के,
कहीं सलीके से।
वो जो यूँ ही फैले पड़े हैं,
कुछ ख़्याल मेरे बिखरे से।
Wednesday, 10 June 2015
ये वक़्त है भाग रहा...
फिसलता हाथों से,
रेत की तरह।
बदलता रूप कितने,
प्रेत की तरह।
जाने है सो गया,
या फिर है जाग रहा।
दौड़ रहा है सरपट,
ये वक़्त है भाग रहा।
एक पल पहले था कुछ,
एक पल बाद है कुछ।
रुला रहा किसी पल में,
तो कर रहा किसी पल खुश।
ताँक रहा कल की खिड़की से,
अगले पल से है झाँक रहा।
दौड़ रहा है सरपट,
ये वक़्त है भाग रहा।
कल था मेरा ये,
आज शायद है तेरा ये।
ना हुआ किसी का कभी,
ना शायद कभी होगा ही।
अपनी ही किसी दौड़ में,
ये खुद को ही पछाड़ रहा।
दौड़ रहा है सरपट,
ये वक़्त है भाग रहा।
कभी दे रहा है ज़िन्दगी,
कभी बन कर आया काल है।
बेमतलब कब बीता ये,
इसके हर पल पे सवाल है।
बना रहा काम सारे कभी,
कभी सारे ही काम बिगाड़ रहा।
दौड़ रहा है सरपट,
ये वक़्त है भाग रहा।
यूँ बाँध कलाई पे,
इसे चाहते हैं हम थामना।
पर ना हुआ कोई कभी,
जो कर सका हो इसका सामना।
वक़्त से वक़्त की हौड़ में,
हर वक़्त कोई हार रहा।
दौड़ रहा है सरपट,
ये वक़्त है भाग रहा।
Friday, 5 June 2015
शायद...
कभी-कभी हम जब अकेले बैठ कर अपनी ज़िन्दगी के पन्नों को पलटते हैं, तो हमारे ज़हन में ये ख़्याल उमड़ते हैं कि शायद उस दिन, उस वक़्त, उस लम्हे में अगर वो हुआ होता तो जाने आज ज़िन्दगी की तस्वीर क्या होती? क्या पता उस लम्हे में अगर कदम बढ़ा दिए होते तो शायद मंज़िल मिल ही गई होती? क्या पता अपने दिल को अगर आज़ाद छोड़ दिया होता तो शायद आज ये अपनी ख्वाहिशों के खुले आसमान में उड़ रहा होता? शायद ये हुआ होता तो वो हो गया होता, या शायद वो हुआ होता तो ये हो गया होता।
इसी उधेड़बुन में ज़्यादातर बातें जो हो चुकी हैं और ज़्यादातर लम्हे जो जिये जा चुके हैं, हम उन्हे किसी और रूप में देख या सोच लेते हैं। कभी-कभी तो मुझे लगता है कि कहीं ना कहीं हमारी आज की ज़िन्दगी में कुछ तो ऐसी कमी ज़रूर रह गई है जिसकी वजह से हमारे पास आज जो भी है हम उससे खुश नही हैं। या फिर हम संतुष्ट नही हैं, ना अपने आज से, ना जो मिला है उससे। कारण चाहे जो भी हो, पर है तो सही।
आपको लग रहा होगा कि ऐसा पोस्ट कोई ऐसा ही इन्सान लिख सकता है जो अपनी ज़िन्दगी से पूरी तरह नाख़ुश होगा। पर यकीन मानिये मैं अपनी ज़िन्दगी से नाख़ुश तो बिल्कुल नही हूँ, हाँ कभी-कभी ऐसा ज़रूर लगता है कि अगर उस वक़्त ये ना होकर वो हो गया होता तो शायद आज नज़ारा ही कुछ और होता। और मेरा विश्वास कीजिये मेरी ऐसी सोच इसीलिये नही है क्यूँकि मेरे साथ आज तक जो भी हुआ है, वो सब गलत ही हुआ है। लेकिन हाँ यकीनन कुछ ऐसी चीज़ें हम सभी की ज़िन्दगियों में होती रहती हैं जो उस तरीके से नही हो पाती हैं जैसे उन्हे होना चाहिये था। या यूँ कहिये कि-
"हर किसी को यहाँ मुक्कमल जहाँ नही मिलता।
किसी को ज़मीं, तो किसी को आसमाँ नही मिलता।।"
वैसे कुछ हद तक ऐसा सोचने में बुरा भी क्या है? आप सोचिये एक बार, क्या आपके साथ कभी ऐसा नही हुआ है? क्या कभी एक बार के लिए भी आपको ये नही लगा कि अगर उस वक़्त ज़िन्दगी ने इस तरह से करवट ली होती या ना ली होती, तो इसकी तस्वीर आज कुछ और ही होती? मैं यकीन के साथ कह सकती हूँ कि आप सभी के साथ ऐसा हुआ होगा, और ज़रूर हुआ होगा। और शायद किसी के साथ तो एक से ज़्यादा बार भी हुआ हो। तो क्या ये एक नकारात्मक सोच है? क्या अपनी ज़िन्दगी की किताब के पिछले पन्नों को पलट कर देखना गलत है? क्या ऐसा करके हम अपने भूतकाल को, अपने वर्तमान और अपने भविष्य के रास्ते की रुकावट बना देते हैं? या क्या ऐसा सोच कर हम अपने बीते कल को, अपने आज और अपने आने वाले कल का शत्रु बना देते हैं?
शायद...इन सभी प्रश्नों के उत्तर आपको हाँ में मिलें अगर आप अपने कल की बुरी यादों को अपने सीने से चिपका कर बैठे रहें। लेकिन अगर आप अपने कल को सिर्फ इसलिये याद करते हैं ताकि आप बीते कल की गलतियों को ना दोहरायें तो बेशक उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर आपके लिए तो ना में ही होंगे। आप जब-जब बैठकर किसी भी ऐसे शायद के बारे में सोचते हैं और ये निष्कर्ष निकालते हैं कि अगर इस काम को मैंने ऐसे किया होता तो शायद सब कुछ सही हुआ होता। तो यकीन मानिये ये एक नकारात्मक नही वरन् एक सकारात्मक सोच है। यहाँ जो शायद शब्द आप प्रयोग में ला रहे हैं वो कहीं ना कहीं आपके बीते कल की गलती से आपको कुछ सिखा ही रहा है और उससे भी बढ़कर ये शब्द आपको दोबारा उस गलती को दोहराने से बचा रहा है।
तो दोस्तों मैं भी सोचती हूँ और आप भी सोचिये कि
"शायद ये हुआ होता, तो वो हो गया होता...!" :-)
लिखने बैठे...तो सोचा...
लिखने बैठे, तो सोचा, यूँ लिख तो और भी लेते हैं, ऐसा हम क्या खास लिखेंगे? कुछ लोगों को तो ये भी लगेगा, कि क्या ही होगा हमसे भला, हम फिर कोई ब...
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कहते हैं जननी से धन्य ना कोई हो सका है और ना ही कभी होगा। एक माँ जो अपने बच्चे को अपने ही रक्त से सींचती है, उसे अपने ही शरीर का हिस्सा देक...
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याद नही मुझको यूँ तो, हर याद मेरे बचपन की। याद नही मुझको यूँ तो, हर बात मेरे बचपन की। फिर भी कुछ तो है ऐसा, जिसको मैं अब तक भूली नह...
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हम इंसानों की एक ख़ास बात ये है कि हम में से बस कुछ लोगों को छोड़ दिया जाये तो बाकी के सभी मनुष्य सफाई पसन्द होते हैं। हमें सफ़ाई इतनी पसन्द ह...