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Thursday, 14 November 2019

काश...

कभी-कभी यूँ लगता है,
ज़िन्दगी जैसे मज़े ले रही हो हमारे!
ये है आका कोई ज़िद्दी,
और हम गुलाम कोई हों बेचारे!
चलाती है खुद की ही मर्ज़ी जैसे,
दिन अजीब से दिखा दिये कई ऐसे!
हमने कुछ और माँगा, इसने कुछ और दिया,
हमने कुछ और सोचा, इसने कुछ और किया!
हिसाब से हमारे कब चली है ये,
जाने अपने ही किसी रंग में ढली है ये!
जब लगा कि हाँ सब सही हो चला है,
उसी पल कोई मोड़ नया ले लिया इसने!
कभी ढ़ेर सारी खुशियाँ दे दी यूँ ही,
तो कभी ग़मों के बीच छोड़ दिया इसने!
कभी दर्द, आँसू, तकलीफें हज़ार दीं,
कभी यूँ ही दे कर रौशनी नज़र उतार ली!
कमाल के कई खेल, खेल लेती है कभी तो,
हाँ, पर कुछ तो ये ज़रूर देती है सभी को!
यूँ सब ठीक है, कोई शिकायत नही है,
ज़िन्दगी की ऐसी भी बुरी कोई आदत नही है!
पर कभी-कभी यूँ लगता है,
हाँ सच में यूँ लगता है,
काश, ज़िन्दगी ऐसी होती,
काश, ज़िन्दगी वैसी होती,
सारी हमारे हिसाब से ना सही,
कुछ तो लाज़वाब-सी होती!
काश...

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