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Thursday, 26 March 2015

मर्यादा

दिन भर काम करके शशि थक चुकी थी और तभी अनन्त का फोन आया कि आज मेरे दो-चार दोस्त खाने पर मेरे साथ घर आ रहे हैं तो तुम बाहर से खाना मँगवा लो और अच्छे से तैयार हो जाओ। शशि बेचारी दिन भर की थकान को मिटाने के लिये थोड़ी देर आराम करना चाहती थी। लेकिन इस अचानक आये फोन ने उसे यह ख़्याल अपने ज़हन से निकालने को मज़बूर कर ही दिया। और बिस्तर की ओर मुड़ने की बजाये वह अपने मुँह-हाथ धोने चल पड़ी। एक घंटे से भी कम समय दिया था अनन्त ने उसे। इस एक घंटे में उसे तैयार भी होना था, घर को भी ठीक-ठाक करना था, खाना मँगवाना था और आने वाले मेहमानों के लिए कुछ और तैयारियाँ भी करनी थीं। बहरहाल वह जानती थी कि करना उसी को है सो किसी ना किसी तरह उसने उस एक घंटे में सारा काम निपटा ही लिया। ठीक एक घंटे बाद घर के दरवाज़े की घंटी बजी, शशि ने दरवाजा खोला और एक बहुत मीठी-सी मुस्कान के साथ अपने पति और उसके दोस्तों का स्वागत किया। और फिर एक कुशल मेजबान की तरह अपने मेहमानों की आव-भगत में लग गई। कुछ देर बाद अनन्त का एक दोस्त शशि से कहने लगा,"अरे भाभी जी थोड़ी देर हमारे पास भी बैठिये, हम जब से आये हैं आप बस काम में ही लगी हैं।" यह सुनकर शशि ने कहा,"अरे भाईसाब, मैं कहीं ओर थोड़ी हूँ, यहीं हूँ आप सभी लोगों के साथ ही। आज आप मेहमान हैं हमारे यहाँ तो आज मेरा फ़र्ज़ है कि मैं आप सब लोगों की आव-भगत अच्छे से करूँ।" अनन्त जोकि अब तक चुपचाप बैठा सब सुन रहा था, धीरे से शशि के पास गया और उसके कान में बोला,"अरे यार जब ये लोग इतना कह रहे हैं तो बैठ क्यूँ नही जाती हो थोड़ी देर हम सबके साथ? इतना भी क्या काम है तुम्हे जो दो-चार मिनट हमारे साथ भी नही बैठ सकती हो? कौन सा खाना तुमने बनाया है? चलो भी अब, सब यहीं देख रहे हैं। ज़्यादा नाटक तो मत करो अब।" और अनन्त ने शशि का हाथ पकड़ कर उसे अपने साथ बिठा लिया। बातों का दौर शुरू हुआ। कभी अनन्त के किसी दोस्त ने, तो कभी किसी दोस्त ने शशि से बात की। शशि की एक खूबी यह थी कि वह अच्छी वक्ता भी थी और अच्छी श्रोता भी। और इसीलिये लोग जल्दी ही उसकी बातों से प्रभावित हो जाया करते थे। कोई जादू-सा था उसकी बातों में और बहुत कम लोग ही थे जो उसके इस जादू से बच पाते थे। अनन्त खुद भी इसी जादू का शिकार हुआ था। वक़्त काफी हो चला था और बातें थीं कि खत्म ही नही हो रही थीं। इस बीच अनन्त को अपनी धर्मपत्नी का अपने दोस्तों के साथ इतना घुल-मिल कर बात करना कतई नही भा रहा था। वह कभी हाथों के, तो कभी आँखों के ईशारों से शशि को रोकने की कोशिश कर रहा था। पर शशि शायद बातों में इतनी मग्न हो चुकी थी कि वह ना कुछ देख ही पाई और ना समझ ही पाई। और इस सब ने अनन्त के भीतर के गुस्से की ज्वाला को और भड़का दिया। आखिरकार दोस्तों की वह महफ़िल खत्म होने को आई। सब दोस्त धीरे-धीरे विदा लेने लगे। जाते-जाते भी वे शशि की मेजबानी और वाकपटुता की तारीफ़ करते गए।
सबके जाने के बाद अनन्त तो सीधा अपने कमरे की ओर चल पड़ा, आराम करने और बेचारी शशि सारा बिखरा घर सम्भालने में लग गई। दिन भर थकी होने के बाद भी जल्दी ही उसने सारा घर समेट दिया। और अपने कमरे की ओर चली दी। यूँ अनन्त सो ही चुका था, लेकिन शशि की आवाज़ सुनकर जाग गया। तभी शशि बोली,"ओह, सॉरी, मैंने तुम्हे उठा दिया। आज बहुत थक गई हूँ सच्ची। तुम भी ना अचानक ही प्रोग्राम बना लेते हो कभी-कभी।" "क्यूँ मुझे तो लगा तुमने ये शाम खूब एन्जॉय की।"अनन्त ने शशि को बीच में टोकते हुए कहा। "हाँ, मजा तो आया।" शशि यह कह कर अपने बाल सँवारने लगी। अनन्त कुछ सेकण्ड उसकी तरफ चुपचाप देखता रहा और बोला,"तुम कई बार हद कर देती हो और इतनी हद कर देती हो कि ये तक भूल जाती हो की एक औरत की कुछ मर्यादायें भी होती हैं। मैंने तुमसे हम सबके पास बैठने को कहा था, बेशर्मों की तरह हँसने-बोलने के लिये नही, क्या सोचते होंगे मेरे दोस्त?"
अनन्त के ये शब्द शशि के दिल पर बाणों की तरह जा कर लगे। वह सोचने लगी मैं तो बैठ भी नही रही थी उन सबके साथ, अनन्त ने खुद ज़बरदस्ती मुझे बैठाया था और अब... और अब इसे लगता है कि मैं अपनी मर्यादायें भूल गई हूँ। क्या सच में? अनन्त तो यह कर कर आराम से सो गया। लेकिन इस एक बात या कहिये कि इस एक प्रश्न ने शशि को सारी रात सोने नही दिया। वह रात भर सोचती रही कि क्या सच में आज वह एक औरत की मर्यादा भूल गई थी? क्या अनन्त सच कह रहा है? और रात भर यह 'क्या' शब्द उसे झकझोरता रहा।

लिखने बैठे...तो सोचा...

लिखने बैठे, तो सोचा, यूँ लिख तो और भी लेते हैं, ऐसा हम क्या खास लिखेंगे? कुछ लोगों को तो ये भी लगेगा, कि क्या ही होगा हमसे भला, हम फिर कोई ब...