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Tuesday, 19 May 2015

वो यादें मेरे बचपन की


याद नही मुझको यूँ तो,
हर याद मेरे बचपन की।
याद नही मुझको यूँ तो,
हर बात मेरे बचपन की।
फिर भी कुछ तो है ऐसा,
जिसको मैं अब तक भूली नही।
हाँ, याद है मुझको कैसे,
माँ की गोद मेरा बिस्तर थी।
याद तो हाँ ये भी है कि
मैं तड़पती बिन माँ किस तरह थी।
माँ के पीछे-पीछे भागना था,
सबसे प्यारा खेल मेरा।
आँसूं छलक आते थे जो ना होता,
माँ से जल्दी मेल मेरा।
याद है मुझको कैसे माँ,
मेरे गिरने पर ज़मीन को मारती थी।
हाँ ये भी याद है कैसे,
उसके बाद मुझे माँ पुचकारती थी।
जब पापा आते थे ऑफिस से,
माँ किस्से उन्हें मेरे सुनाती थी।
पूरे दिन की मेरी दिनचर्या का,
माँ हाल पूरा-पूरा बताती थी।
मेरे हँसने, मेरे रोने पे कैसे,
जान माँ अपनी छिड़कती थी।
जब-जब कोई छेड़ता था मुझे,
तो माँ खूब भड़कती थी।
याद है मुझको आज भी,
माँ के हाथ की बनी सब्जी।
वो सब्जी जिसपे फ़िदा थे,
सारे ही तो दोस्त मेरे।
माँ ना थकी, ना रुकी कभी,
मेरी शरारतों पे नही की शिकायत कोई।
बचपन गया, गुज़रे साल,
ना माँ बदली, ना माँ का प्यार।
आज भी माँ वैसी ही है,
आज भी माँ प्यारी ही है।
कभी-कभी गुस्से में शायद,
मैंने उनको कुछ तो सुनाया होगा।
शायद अनजाने में ही सही,
पर दिल उनका दुखाया होगा।
माँ रूठी भी हैं, माँ नाराज़ भी हुई,
पर मोहब्बत में माँ की ना आई कमी कोई।
कभी-कभी मैं सोचती हूँ,
इतनी शक्ति माँ में कहाँ से आती है?
भला कैसे एक अकेली माँ,
सारे ही घर को सम्भाल जाती है।
एक दिन शायद मैं भी,
इस राज़ को जान जाऊँगी।
माँ किस शक्ति का है रूप,
मैं भी एक दिन पहचान जाऊँगी।
माँ को मैंने कभी ये कहा नही,
माँ को ये मैंने कभी बताया नही।
देना चाहती हूँ एक दिन मैं माँ को,
एक ख़ूबसूरत-सा तोहफ़ा।
एक अनमोल-सा, नायाब-सा,
जिसकी कोई कीमत भी ना आँक सके।
काश मैं अपनी हर बात में,
माँ की दी शिक्षा को दिखा पाऊँ।
काश मैं अपनी हर याद में,
माँ की भी एक याद को सजा पाऊँ।
यूँ सब कुछ तो मुझको याद नही,
यूँ सब कुछ तो मैं भूली भी नही।
फिर भी याद है मुझे माँ,
वो यादें मेरे बचपन की...
वो यादें मेरे बचपन की...

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