Showing posts with label दौड़. Show all posts
Showing posts with label दौड़. Show all posts

Wednesday, 10 June 2015

ये वक़्त है भाग रहा...

फिसलता हाथों से,
रेत की तरह।
बदलता रूप कितने,
प्रेत की तरह।
जाने है सो गया,
या फिर है जाग रहा।
दौड़ रहा है सरपट,
ये वक़्त है भाग रहा।

एक पल पहले था कुछ,
एक पल बाद है कुछ।
रुला रहा किसी पल में,
तो कर रहा किसी पल खुश।
ताँक रहा कल की खिड़की से,
अगले पल से है झाँक रहा।
दौड़ रहा है सरपट,
ये वक़्त है भाग रहा।

कल था मेरा ये,
आज शायद है तेरा ये।
ना हुआ किसी का कभी,
ना शायद कभी होगा ही।
अपनी ही किसी दौड़ में,
ये खुद को ही पछाड़ रहा।
दौड़ रहा है सरपट,
ये वक़्त है भाग रहा।

कभी दे रहा है ज़िन्दगी,
कभी बन कर आया काल है।
बेमतलब कब बीता ये,
इसके हर पल पे सवाल है।
बना रहा काम सारे कभी,
कभी सारे ही काम बिगाड़ रहा।
दौड़ रहा है सरपट,
ये वक़्त है भाग रहा।

यूँ बाँध कलाई पे,
इसे चाहते हैं हम थामना।
पर ना हुआ कोई कभी,
जो कर सका हो इसका सामना।
वक़्त से वक़्त की हौड़ में,
हर वक़्त कोई हार रहा।
दौड़ रहा है सरपट,
ये वक़्त है भाग रहा।

लिखने बैठे...तो सोचा...

लिखने बैठे, तो सोचा, यूँ लिख तो और भी लेते हैं, ऐसा हम क्या खास लिखेंगे? कुछ लोगों को तो ये भी लगेगा, कि क्या ही होगा हमसे भला, हम फिर कोई ब...