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Friday, 5 June 2015

शायद...

कभी-कभी हम जब अकेले बैठ कर अपनी ज़िन्दगी के पन्नों को पलटते हैं, तो हमारे ज़हन में ये ख़्याल उमड़ते हैं कि शायद उस दिन, उस वक़्त, उस लम्हे में अगर वो हुआ होता तो जाने आज ज़िन्दगी की तस्वीर क्या होती? क्या पता उस लम्हे में अगर कदम बढ़ा दिए होते तो शायद मंज़िल मिल ही गई होती? क्या पता अपने दिल को अगर आज़ाद छोड़ दिया होता तो शायद आज ये अपनी ख्वाहिशों के खुले आसमान में उड़ रहा होता? शायद ये हुआ होता तो वो हो गया होता, या शायद वो हुआ होता तो ये हो गया होता।

इसी उधेड़बुन में ज़्यादातर बातें जो हो चुकी हैं और ज़्यादातर लम्हे जो जिये जा चुके हैं, हम उन्हे किसी और रूप में देख या सोच लेते हैं। कभी-कभी तो मुझे लगता है कि कहीं ना कहीं हमारी आज की ज़िन्दगी में कुछ तो ऐसी कमी ज़रूर रह गई है जिसकी वजह से हमारे पास आज जो भी है हम उससे खुश नही हैं। या फिर हम संतुष्ट नही हैं, ना अपने आज से, ना जो मिला है उससे। कारण चाहे जो भी हो, पर है तो सही।

आपको लग रहा होगा कि ऐसा पोस्ट कोई ऐसा ही इन्सान लिख सकता है जो अपनी ज़िन्दगी से पूरी तरह नाख़ुश होगा। पर यकीन मानिये मैं अपनी ज़िन्दगी से नाख़ुश तो बिल्कुल नही हूँ, हाँ कभी-कभी ऐसा ज़रूर लगता है कि अगर उस वक़्त ये ना होकर वो हो गया होता तो शायद आज नज़ारा ही कुछ और होता। और मेरा विश्वास कीजिये मेरी ऐसी सोच इसीलिये नही है क्यूँकि मेरे साथ आज तक जो भी हुआ है, वो सब गलत ही हुआ है। लेकिन हाँ यकीनन कुछ ऐसी चीज़ें हम सभी की ज़िन्दगियों में होती रहती हैं जो उस तरीके से नही हो पाती हैं जैसे उन्हे होना चाहिये था। या यूँ कहिये कि-

"हर किसी को यहाँ मुक्कमल जहाँ नही मिलता।
किसी को ज़मीं, तो किसी को आसमाँ नही मिलता।।"

वैसे कुछ हद तक ऐसा सोचने में बुरा भी क्या है? आप सोचिये एक बार, क्या आपके साथ कभी ऐसा नही हुआ है? क्या कभी एक बार के लिए भी आपको ये नही लगा कि अगर उस वक़्त ज़िन्दगी ने इस तरह से करवट ली होती या ना ली होती, तो इसकी तस्वीर आज कुछ और ही होती? मैं यकीन के साथ कह सकती हूँ कि आप सभी के साथ ऐसा हुआ होगा, और ज़रूर हुआ होगा। और शायद किसी के साथ तो एक से ज़्यादा बार भी हुआ हो। तो क्या ये एक नकारात्मक सोच है? क्या अपनी ज़िन्दगी की किताब के पिछले पन्नों को पलट कर देखना गलत है? क्या ऐसा करके हम अपने भूतकाल को, अपने वर्तमान और अपने भविष्य के रास्ते की रुकावट बना देते हैं? या क्या ऐसा सोच कर हम अपने बीते कल को, अपने आज और अपने आने वाले कल का शत्रु बना देते हैं?

शायद...इन सभी प्रश्नों के उत्तर आपको हाँ में मिलें अगर आप अपने कल की बुरी यादों को अपने सीने से चिपका कर बैठे रहें। लेकिन अगर आप अपने कल को सिर्फ इसलिये याद करते हैं ताकि आप बीते कल की गलतियों को ना दोहरायें तो बेशक उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर आपके लिए तो ना में ही होंगे। आप जब-जब बैठकर किसी भी ऐसे शायद के बारे में सोचते हैं और ये निष्कर्ष निकालते हैं कि अगर इस काम को मैंने ऐसे किया होता तो शायद सब कुछ सही हुआ होता। तो यकीन मानिये ये एक नकारात्मक नही वरन् एक सकारात्मक सोच है। यहाँ जो शायद शब्द आप प्रयोग में ला रहे हैं वो कहीं ना कहीं आपके बीते कल की गलती से आपको कुछ सिखा ही रहा है और उससे भी बढ़कर ये शब्द आपको दोबारा उस गलती को दोहराने से बचा रहा है।

तो दोस्तों मैं भी सोचती हूँ और आप भी सोचिये कि

"शायद ये हुआ होता, तो वो हो गया होता...!" :-)

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