था ठहरा सब कुछ,
जाने कितने दिनों से।
जड़ता जाने ये कैसी थी,
थी भी कहीं या नही थी।
ना शब्द मिले, ना कलम चली,
ज़िन्दगी थमी, पर रुकी नही।
कुछ लिखने को ना था,
बात ये भी बिल्कुल ना थी।
मन में मन के ख़्याल थे,
ज़िन्दगी के उलझे सवाल थे।
वक़्त की ना थी कमी कोई,
मैं ही थी शायद कहीं खोई।
हाँ शायद पहचाना है खुद को,
इन दिनों बहुत जाना है खुद को।
ज़ाया कुछ भी यूँ ही कहाँ गया,
समझो वक़्त ने मुझे थोड़ा वक़्त दिया।
ठहराव था एक ये ज़िन्दगी का,
बदलाव था एक ये ज़िन्दगी का।
अब जो उठा ली है ये कलम,
रुकना कहाँ है, मुझे पता नही।
Friday, 1 June 2018
ठहराव
Sunday, 28 February 2016
भीड़
कभी पास से गुज़र गई,
और कभी साथ खड़ी हुई,
चेहरों पे चेहरों को लपेटे,
खुद में कितने भाव समेटे,
कभी इस राह पर,
तो कभी उस राह पर,
बिना रुके, बिना थके,
उमड़ आती तूफ़ान-सी,
कभी बचपन-सी मासूम,
कभी बुढ़ापे-सी बेबस,
कहीं मिलते हंसों के जोड़े हैं,
कहीं लड़ते बेमतलब से मोहरे हैं,
लबों पे थोपे हुए एक नकली हँसी,
दबाये हुए सीने में अपने राज़ कईं,
जाने क्यों ये कभी रूकती नही,
जाने क्यों ये कभी ठहरती नही,
अजनबी-सी कभी,
तो कभी अपनी-सी,
मेरे साथ बढ़ती,
मेरे साथ चलती,
ये भीड़ होकर भी,
है महफ़िल तन्हा लोगों की|
Tuesday, 18 August 2015
आशायें...
अँधेरे रास्तों में,
बनके रोशनी-सी।
फीके जीवन में,
घुलके चाशनी-सी।।
कभी मंज़िल के निशाँ,
कभी दिल के अरमाँ।
कभी कोई ख़्वाब,
कभी कोई जवाब।।
टूटते को जोड़ गई,
भरम को तोड़ गई।
बिखरते को समेट गई,
ख्यालों में लपेट गई।।
चाहतों को ज़िंदा करके,
मुश्किलों को शर्मिन्दा करके।
हौंसलों को सख़्त करके,
सर्द रातों को तप्त करके।।
तन्हाईयों में दोस्त जैसी,
बेचैनियों में राहत जैसी।
दर्द में मलहम जैसी,
दिल की धड़कन जैसी।।
निराशाओं से उभारती,
ज़िन्दगी को सँवारती।
गिरते को सम्भालती,
हर डर से निकालती।।
अधूरी ज़िन्दगी में,
पूरी ज़िन्दगी ले आई।
ये आशायें ज़रा देखो तो,
बनके क्या-क्या ना आई।।
Wednesday, 24 June 2015
Different Faces of a Father
1) The Father
He is playing a father's role when he is holding your hand and helping you to take the first step of your life as a child. He ia playing a father when he let you enjoy a horse ride on his back. He is a father when he holds your hand firmly in his own hand and let you feel the warmth of his hand.
2) The Friend
He is playing a friend when he is playing cricket with you or when he is running madly in the lawn. When he is breaking the window glasses of the neighbors with you at that very moment he is a friend to you. When he clings to you in your bad days he is your friend.
Friday, 19 June 2015
कुछ ख़्याल मेरे बिखरे से...
याद नही कब से,
पर लिखने का शौंक है मुझे।
कभी कागजों पर,
कभी कापियों पर।
यूँ बहुत कुछ,
लिख चुकी हूँ मैं।
ना मिला कुछ तो,
किसी फटे तन्हा पन्ने पर।
काली स्याही में तो,
कभी लाल रंग में डुबो कर।
कभी एक पंक्ति में,
कभी एक शब्द में।
अपने लिए भी लिखा,
लिखा किसी ख़ास के लिए भी।
महफ़िल पर, तन्हाई पर,
इश्क़ पर, रुसवाई पर।
गुस्से पे काबू पाने को,
तो कभी किसी को जलाने को।
भाषा कभी ईशारों की थी,
तो थी कभी व्यंग्य की।
होकर बेबाक लिखा,
सोचकर बिंदास लिखा।
शब्दों को तोड़ा-मरोड़ा,
जज़्बातों को जमकर निचोड़ा।
लिख कर मिटाया बहुत बार,
कागज़ों को जलाया बहुत बार।
किसी को शिकायत रही,
तो कोई तारीफ़ करने लगा।
कोई कहने लगा पागल हो,
कोई बोला, डूबते का साहिल हो।
मुझसे शिकायत है बहुतों को,
मुझसे कोई शिकवा भी है।
यूँ साथ है दुनिया,
पर 'मन' कहीं तन्हा भी है।
मेरे शब्दों में छिपा है,
बहुत कुछ मुझसे जुड़ा।
यूँ कहानी मैंने अपनी,
आज तक कहीं लिखी नही।
पर मेरे दिल की तस्वीर,
मेरे शब्दों में क्या दिखी नही?
मैं वही हूँ जो बताते हैं शब्द मेरे,
मैं वही हूँ जो दिखाते हैं शब्द मेरे।
यूँ लिखती रहूँगी,
आख़िर शौंक है लिखना मेरा।
जड़ होते इस 'मन' को,
शब्द ही देते जान हैं।
यूँ देह चलती-फिरती है,
शब्द फूँकते इनमें प्राण हैं।
बहुत कुछ लिख चुकी हूँ,
बहुत कुछ लिखूँगी अभी।
हैं बहुत से ज़ज़्बात,
जो शब्दों में कभी उतरे ही नही।
अब सोचती हूँ एक दिन,
सम्भाल लूँ ज़रा उन्हे भी।
रख दूँ उठा के,
कहीं सलीके से।
वो जो यूँ ही फैले पड़े हैं,
कुछ ख़्याल मेरे बिखरे से।
Wednesday, 10 June 2015
ये वक़्त है भाग रहा...
फिसलता हाथों से,
रेत की तरह।
बदलता रूप कितने,
प्रेत की तरह।
जाने है सो गया,
या फिर है जाग रहा।
दौड़ रहा है सरपट,
ये वक़्त है भाग रहा।
एक पल पहले था कुछ,
एक पल बाद है कुछ।
रुला रहा किसी पल में,
तो कर रहा किसी पल खुश।
ताँक रहा कल की खिड़की से,
अगले पल से है झाँक रहा।
दौड़ रहा है सरपट,
ये वक़्त है भाग रहा।
कल था मेरा ये,
आज शायद है तेरा ये।
ना हुआ किसी का कभी,
ना शायद कभी होगा ही।
अपनी ही किसी दौड़ में,
ये खुद को ही पछाड़ रहा।
दौड़ रहा है सरपट,
ये वक़्त है भाग रहा।
कभी दे रहा है ज़िन्दगी,
कभी बन कर आया काल है।
बेमतलब कब बीता ये,
इसके हर पल पे सवाल है।
बना रहा काम सारे कभी,
कभी सारे ही काम बिगाड़ रहा।
दौड़ रहा है सरपट,
ये वक़्त है भाग रहा।
यूँ बाँध कलाई पे,
इसे चाहते हैं हम थामना।
पर ना हुआ कोई कभी,
जो कर सका हो इसका सामना।
वक़्त से वक़्त की हौड़ में,
हर वक़्त कोई हार रहा।
दौड़ रहा है सरपट,
ये वक़्त है भाग रहा।
Friday, 5 June 2015
शायद...
कभी-कभी हम जब अकेले बैठ कर अपनी ज़िन्दगी के पन्नों को पलटते हैं, तो हमारे ज़हन में ये ख़्याल उमड़ते हैं कि शायद उस दिन, उस वक़्त, उस लम्हे में अगर वो हुआ होता तो जाने आज ज़िन्दगी की तस्वीर क्या होती? क्या पता उस लम्हे में अगर कदम बढ़ा दिए होते तो शायद मंज़िल मिल ही गई होती? क्या पता अपने दिल को अगर आज़ाद छोड़ दिया होता तो शायद आज ये अपनी ख्वाहिशों के खुले आसमान में उड़ रहा होता? शायद ये हुआ होता तो वो हो गया होता, या शायद वो हुआ होता तो ये हो गया होता।
इसी उधेड़बुन में ज़्यादातर बातें जो हो चुकी हैं और ज़्यादातर लम्हे जो जिये जा चुके हैं, हम उन्हे किसी और रूप में देख या सोच लेते हैं। कभी-कभी तो मुझे लगता है कि कहीं ना कहीं हमारी आज की ज़िन्दगी में कुछ तो ऐसी कमी ज़रूर रह गई है जिसकी वजह से हमारे पास आज जो भी है हम उससे खुश नही हैं। या फिर हम संतुष्ट नही हैं, ना अपने आज से, ना जो मिला है उससे। कारण चाहे जो भी हो, पर है तो सही।
आपको लग रहा होगा कि ऐसा पोस्ट कोई ऐसा ही इन्सान लिख सकता है जो अपनी ज़िन्दगी से पूरी तरह नाख़ुश होगा। पर यकीन मानिये मैं अपनी ज़िन्दगी से नाख़ुश तो बिल्कुल नही हूँ, हाँ कभी-कभी ऐसा ज़रूर लगता है कि अगर उस वक़्त ये ना होकर वो हो गया होता तो शायद आज नज़ारा ही कुछ और होता। और मेरा विश्वास कीजिये मेरी ऐसी सोच इसीलिये नही है क्यूँकि मेरे साथ आज तक जो भी हुआ है, वो सब गलत ही हुआ है। लेकिन हाँ यकीनन कुछ ऐसी चीज़ें हम सभी की ज़िन्दगियों में होती रहती हैं जो उस तरीके से नही हो पाती हैं जैसे उन्हे होना चाहिये था। या यूँ कहिये कि-
"हर किसी को यहाँ मुक्कमल जहाँ नही मिलता।
किसी को ज़मीं, तो किसी को आसमाँ नही मिलता।।"
वैसे कुछ हद तक ऐसा सोचने में बुरा भी क्या है? आप सोचिये एक बार, क्या आपके साथ कभी ऐसा नही हुआ है? क्या कभी एक बार के लिए भी आपको ये नही लगा कि अगर उस वक़्त ज़िन्दगी ने इस तरह से करवट ली होती या ना ली होती, तो इसकी तस्वीर आज कुछ और ही होती? मैं यकीन के साथ कह सकती हूँ कि आप सभी के साथ ऐसा हुआ होगा, और ज़रूर हुआ होगा। और शायद किसी के साथ तो एक से ज़्यादा बार भी हुआ हो। तो क्या ये एक नकारात्मक सोच है? क्या अपनी ज़िन्दगी की किताब के पिछले पन्नों को पलट कर देखना गलत है? क्या ऐसा करके हम अपने भूतकाल को, अपने वर्तमान और अपने भविष्य के रास्ते की रुकावट बना देते हैं? या क्या ऐसा सोच कर हम अपने बीते कल को, अपने आज और अपने आने वाले कल का शत्रु बना देते हैं?
शायद...इन सभी प्रश्नों के उत्तर आपको हाँ में मिलें अगर आप अपने कल की बुरी यादों को अपने सीने से चिपका कर बैठे रहें। लेकिन अगर आप अपने कल को सिर्फ इसलिये याद करते हैं ताकि आप बीते कल की गलतियों को ना दोहरायें तो बेशक उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर आपके लिए तो ना में ही होंगे। आप जब-जब बैठकर किसी भी ऐसे शायद के बारे में सोचते हैं और ये निष्कर्ष निकालते हैं कि अगर इस काम को मैंने ऐसे किया होता तो शायद सब कुछ सही हुआ होता। तो यकीन मानिये ये एक नकारात्मक नही वरन् एक सकारात्मक सोच है। यहाँ जो शायद शब्द आप प्रयोग में ला रहे हैं वो कहीं ना कहीं आपके बीते कल की गलती से आपको कुछ सिखा ही रहा है और उससे भी बढ़कर ये शब्द आपको दोबारा उस गलती को दोहराने से बचा रहा है।
तो दोस्तों मैं भी सोचती हूँ और आप भी सोचिये कि
"शायद ये हुआ होता, तो वो हो गया होता...!" :-)
लिखने बैठे...तो सोचा...
लिखने बैठे, तो सोचा, यूँ लिख तो और भी लेते हैं, ऐसा हम क्या खास लिखेंगे? कुछ लोगों को तो ये भी लगेगा, कि क्या ही होगा हमसे भला, हम फिर कोई ब...
-
कहते हैं जननी से धन्य ना कोई हो सका है और ना ही कभी होगा। एक माँ जो अपने बच्चे को अपने ही रक्त से सींचती है, उसे अपने ही शरीर का हिस्सा देक...
-
याद नही मुझको यूँ तो, हर याद मेरे बचपन की। याद नही मुझको यूँ तो, हर बात मेरे बचपन की। फिर भी कुछ तो है ऐसा, जिसको मैं अब तक भूली नह...
-
हम इंसानों की एक ख़ास बात ये है कि हम में से बस कुछ लोगों को छोड़ दिया जाये तो बाकी के सभी मनुष्य सफाई पसन्द होते हैं। हमें सफ़ाई इतनी पसन्द ह...